Wednesday, December 22, 2010

बिहार गौरव गीत


हमें गर्व है हम है बिहारी , भारत कि शान है ।
जहाँ भी देखो सबसे ऊपर बिहारी का नाम है॥
सीता जी कि जन्मभूमि है ,ज्ञान भूमि यह राम की।
कर्म भूमि यह गाँधी जी की, है इसको अभिमान रे॥
आर्यभट्ट ने शून्य दिया तो, गणनाओ का ज्ञान हुआ।
महावीर और गौतमबुद्ध को यही सत्य का ज्ञान हुआ॥
गुरुगोविंद ने शस्त्र उठाकर शिख्खो को सम्मान दिया।
शेरशाह ने सड़क बना कर एक शूत्र में बांध दिया॥
नालंदा ने ज्योत जला कर पुरे विश्व को ज्ञान दिया ।
बाल्मीकि रामायण लिखकर इसको और महान किया॥
मधुबनी कि भितिचित्रों कि अपनी ही पहचान है ।
सूर्य कि पूजा यहाँ पे होती ऐसा पर्व महान है ॥
कलाकारों में बिस्मिल्ला और ठाकुर जी का नाम है।
दिनकर जी कि है यह भूमि , रेणु की पहचान है ॥
राष्ट्रपति राजेंदर बाबु जयप्रकाश महान है ।
आज़ादी कि लड़ी लड़ाई वीर कुंवर सिंह शान है॥
सम्राटो में अशोक का सबसे ऊपर नाम है ।
गंगा कि यह पावन धरती इसकी यह पहचान है ॥
कल- कल करती नदियाँ बहती हरियाली कि शान है।
पाटलिपुत्र कि इस धरती को बारम-बार प्रणाम है।
हमें गर्व है हम है बिहारी , भारत कि शान है ।
जहाँ भी देखो सबसे ऊपर बिहारी का नाम है॥

Friday, December 3, 2010

हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा

वह बचपन में ही माँ के प्यार से बंचित हो गया था पिता ने दूसरी शादी कर ली थी उसकी उम्र यही कोई सात आठ साल कि रही होगी। उसका बचपन नितांत अकेला था सालो वह अपनी माँ कि यादो में गुमसुम होकर घर के किसी कोने में घंटो आंसू बहाया करता था क्यों कि उसको अपनी माँ से बहुत लगाव था। उसकी माँ क्या गई उसका बचपन ही चला गया। उसकी देख भाल करने वाला भी कोई नहीं था, वह था तो संयुक्त परिवार का ही हिस्सा लेकिन परिवार में भी उसके प्रति किसी कि सोंच सकारात्मक नहीं थी उसका बचपन इन बातों को हमेसा महसुश करता था इसीलिए वह अपने घर में बहुत कम समय गुजार पाता था और अपने बचपन के दोस्तों के साथ ज्यादा समय गुजारता था। जैसे तैसे करके उसने सरकारी स्कूल से मैट्रिक तक कि पढाई कि, मैट्रिक में उसने प्रथम श्रेणी में परीच्छा पास किया जिसके कारण बारह सौ रूपये का उसको स्कालरशिप मिला उस स्कालरशिप के पैसे से ही उसने बीए तक कि पढाई की। पढाई ख़त्म होने के बाद अपने दोस्तों के साथ अपना समय बर्बाद करता था वह समझ नहीं पाता था कि आगे क्या करेगा क्यों कि उसे सही रास्ता बताने वाला भी कोई नहीं था पढाई ख़त्म होने के बाद जब बेकार समय बर्बाद होता है तो लोग उसे आवारा या बदचलन कहते है शायद उसके साथ भी यह बात लागु होती थी जब उसे कोई रास्ता नज़र नहीं आया और हर तरफ से निराष हो गया तो दुसरे शहर में सरकारी नौकरी कर रहे अपने छोटे चाचा से कोई काम धंधा करने के लिए कहा उसके चाचा ने कहा ठीक है तुम मेरे साथ चलो देखता हूँ तुम्हारे लिए कौन सा काम ठीक रहेगा और वो अपने साथ लेकर दुसरे शहर को चले गए क्यों कि वो सरकारी नौकरी में एक अच्छे ओहदे पर थे इसलिए ठीकेदारी करने के लिए उससे कहे और वह ठीकेदारी का काम करने लगा उसके स्वभाव से वह काम मेल नहीं खाता था फिर भी वह काम करता था क्यों कि बेकार से बेगार भला होता है कुछ सालों बाद वह पटना गया और अपने चाचा के घर पर ही रहने लगा चाचा ने शायद उसकी बेबसी को समझे और उससे एक दुकान करने के लिए कहे उसने एक गेनरल स्टोर कि दुकान खोला कुछ सालों बाद उसके चाचा ने एक अच्छी सी लड़की देख उसकी शादी कर दी शादी के बाद कुछ माह तक उसको अपने साथ रखे फिर एक दिन उससे कहे , अब तुम्हारा परिवार हो गया है तुम अपनी जिंदगी अपने तरीके से जियो, इसलिए तुम अपने लिए किराये का मकान लेलो उसने भी अपने चाचा के कहे बातो पर अमल किया और अपने रहने के लिए किराये का मकान ले लिया
समय बीतता गया चार साल में उसके यहाँ दो बच्चो ने जन्म लिया इधर खर्च बढ़ने से उसके व्यापर में नुकसान होता गया नुकसान इतना हुआ कि उसका व्यापर ही बंद हो गया अब उसके पास किराये का मकान था अदद पत्नी और दो छोटे बच्चे हर चीज खरीद कर खाना, आय का कोई जरिया नहीं, आस-पास कोई मददगार भी नहीं, दुकान के वक्त से ही व्यपारियों का चला रहा कुछ बकाया सब मिलाकर हालत बहुत ही दयनीय, फिर भी वह टुटा नहीं बल्कि अन्दर ही अन्दर चट्टान कि तरह अपने इरादों को मजबूत करता गया क्यों कि उसने कुछ सपने पाल रखे थे अपने लिए अपने बच्चो के लिए शायद वह सपने ही उसके हौसले को बुलंद बनाते थे और जीने कि प्रेणना देते थे या ये कहे कि अभाव में गुज़रा उसका बचपन अपने बच्चो को अभाव में परवरिश करना नहीं चाहता था इसलिए बिना पूंजी का उसने व्यापार शुरू किया किराये पर मकान दिलाने का (To-Let Service) जी तोड़ उसने मेहनत करना शुरू किया शुरू में उसे बहुत परेशानिया आई लेकिन धीरे-धीरे सब ठीक होता गया अपनी परिस्थितियों से उसने कभी समझौता नहीं किया और निरंतर अपने काम में वह आगे बढ़ता गया कभी पीछे मुड कर नहीं देखा वह अपने काम के प्रति पूरी तरह लगनशील बना रहा उसके काम करने कि लगन ही निरंतर आगे बढाती गई उसने सरकारी स्कूल में अपनी पढाई कि लेकिन अपने बच्चो को वह प्राइवेट इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढाया उच्च शिच्छा के लिए उसने भारत के दुसरे राज्यों में अपने बच्चो को पढने के लिए भेजा उसके बच्चे पढाई में अच्छे कर रहे है या ये कहे कि अपने पिता के संघर्ष के दिनों को याद रखे है इसलिए एक सुनहरे भविष्य का तानाबाना बुन कर आगे कि तरफ अग्रसर है
यह कहानी उस दिशाहीन युवक कि है जो घोर अभाव में जीवन यापन करने के बाद भी सुनहरे भविष्य का तानाबाना बुना था उसने भविष्य के सपने पाल रखा था और उसके वही सपने जीवन के विकट परिस्थितियों से उसे बहार निकल लेते थे संघर्ष कि पथरीली राहों पर निरंतर आगे बढ़ने कि प्रेणना देते थे उसके सपने उसे कभी टूटने नहीं दिए बल्कि उसके इरादों को और मजबूत बनाते गए, बार-बार निराशा हाथ लगने के बाद भी वह दुगने जोश से अपने कामो में लग जाता था, क्यों कि उसके सपने हमेशा उसे क्रियाशिल बनाये हुए थे और वह अपने सपनो को आकर देने में लगा था
उसके सपने अभी पूरी तरह आकर नहीं ले पाए है और वह आज भी क्रियाशिल है अपने सपनो को आकर देने के लिए वह आज भी चट्टान कि तरह डटा है अपने सपनो को साकार करने के लिए
प्रेणना :- भावी युवा पीढ़ी अपने भविष्य के सपने पाले तो वह जीवन में क्रियाशिल बने रहेगे और अपने सपनो को मूर्तरूप दे पायेगे, क्यों कि सपने जीवन में निरंतर आगे बढ़ने कि प्रेणना देते है

Tuesday, November 30, 2010

एक आम आदमी (श्रधांजलि)

हाँ उनका नाम राम ईश्वर ही था लेकिन हम लोग उनको मुंशी जी कहते थे यही कोई उनकी उम्र साठ, पैसठ साल कि होगी। वो अपने काम के प्रति ईमानदार थे तथा अपने मालिक के प्रति बहुत ही वफादार थे। जिस माकन में मै किराया पर रहता हूँ उसी मकान में वो दरवान का काम करते थे। पिछले तीस सालों से वो मकान मालिक अशोक सिंह के साथ रह रहे थे क्यों कि मकान मालिक अशोक सिंह पहले ठीकेदारी का काम करते थे तब से राम ईश्वर उनके यहाँ मुंशी का काम करते थे। जिस मकान में मै किराये पर रहता हूँ वह मकान मुंशी जी के ही देख रेख में बनी थी और फिर उसी मकान में मुंशी जी दरवान का काम करने लगे थे। मकान मालिक भी उनके रहने के लिए चौथे माले के पानी टंकी के ऊपर एक कमरा बनवा दिए थे उसी में मुंशी जी रहते थे तथा घर कि रखवाली भी करते थे। उनकी दिनचर्या में शामिल था सुबह पांच बजे उठ जाना तथा नित्य क्रियावों से निवृत होकर घर का मेन गेट खोलना तथा हाथ में एक छोला लेकर फुल तोड़ने के लिए घर से निकल जाना, फुल तोड़ कर आने के बाद दस बारह भागो में कुड़ी बना कर प्लास्टिक के थैले में रख कर जितने भी किरायेदार थे सभी के दरवाजे पर थैले को टांगना तथा काल बेल को दबाना ताकि घर वाले को यह जानकारी हो जाये कि मुंशी जी फुल का थैला दरवाजे पर टांग दिए है। हाँ यह अलग बात है कि उस फुल के बदले में पचास रुपया माहवारी वो किरायेदार से लेते थे। किसी के कहे हुए काम को वो अवश्य करते थे कभी ना नहीं कहते थे। बहुत ही सादा जीवन उनका था। वो अपना खाना लकड़ी के चूल्हे पर खुद ही बनाते थे। वो अकेले ही रहते थे इधर कुछ दिनों से उनकी उनकी बेटी जो मात्र नव या दस साल कि होगी साथ रहती थी। गाँव में उनकी पत्नी दो बेटा तथा तीन बेटियां रहती थी। बड़े बेटे कि शादी कर दिए थे जो अपने परिवार के साथ अलग रहता था एक बेटा तथा तीन बेटियां अभी छोटी है और मुंशी जी पर परिवार कि जिम्मेवारी बहुत ज्यादा थी शायद इसी चिंता में मुंशी जी का स्वास्थ दिनों दिन गिरता ही जा रहा था लेकिन वो इतने स्वाभिमानी थे कि अपने दुःख को वो किसी से जाहिर नहीं करते थे। अभी पिछले बीस दिनों पहले उनको कुत्ता ने काट दिया था वो दौड़े हुए आये और मेरे घर का काल बेल दबाये मैंने दरवाजा खोला और कुछ पूछता उसके पहले ही वो बोले मुझे कुत्ता काट लिया है, मै अपनी पत्नी से कहा मुंशी जी को कुत्ता काट लिया है डीटाल लगाकर धो दो और अशोक सिंह को खबर कर दो, ऐसा ही हुआ फिर अशोक सिंह आये और मुंशी जी को अपने गाड़ी में बैठाकर डाक्टर के पास लेकर गए। फिर सुई दवा दिलाकर कुत्ता के काटे हुए जगह पर बैडेज करा कर लाये तथा मुंशी जी को हिदायत दिए कि आपको कही आना-जाना नहीं है आप आराम कीजिये। पहला दिन तो मुंशी जी ने कोई काम नहीं किये लेकिन दुसरे दिन से फिर अपनी दिनचर्या में लग गए। शायद यह उनकी गरीबी थी जो कुत्ता काटने कि स्थिति में भी अपना काम कर रहे थे। इधर २६ या २७ दिसंबर को मुशी जी को ठंड लग गई थी क्यों कि सुबह पांच बजे मुंशी जी फुल तोड़ने के लिए घर से बहार निकल जाते थे शायद सुबह में ही उनको ठंड लग गई होगी। उनको मालूम तब हुआ जब उनको तेज बुखार हो गया तथा एक दो बार कय कर दिए। शयद वो अपने मालिक से कहे होंगे उन्हों ने कुछ दवाइयां दिलवा दी थी वो दवाइयां खा लिए, मुंशी जी जो बराबर नीचे सोते थे २७ दिसम्बर कि रात को वो ऊपर छत पर सोने चले गये। उनके मालिक कहे भी आपकी तबियत ख़राब है आप नीचे ही सोइए लेकिन पता नहीं क्यों वो ऊपर ही चले गए सोने के किये। अचानक २८ दिसंबर कि सुबह साढ़े पांच या छे बजे मेरे फ्लैट का काल बेल बजा और आवाज़ आई मुंशी जी को कुछ हो गया है ऊपर आइये। घबडाये से हम पति पत्नी ऊपर गए देखा सभी फ्लैट के लोग ऊपर में है तथा मुंशी जी छत पर खुले आसमान के नीचे चीत पड़े हुए थे। मुझे उनकी बीमारी कि जानकारी सिर्फ इतनी थी कि उनको हल्का बुखार लगा है इसलिए पूछा क्या हुआ मुंशी जी को, उनकी बच्ची बताई पेशाब करने के लिए रूम से निकले थे पेशाब करने के बाद गिर गए। हम सभी लोगो ने कहा इनको लेकर डाक्टर के पास चला जाय। उनको गाड़ी में लादकर हास्पिटल के लिए भागे। दो हास्पिटल में जो कि बड़ी हास्पिटल है इमरजेंसी में कोई डाक्टर नहीं मिला फिर तीसरे हास्पिटल में उनको लेकर हमलोग आये। यहाँ डाक्टर देख कर बोला अब ये नहीं रहे। यानि कि मुंशी जी कि मृत्यु हो गई थी। गाँव से उनका छोटा बेटा और पत्नी आये और मुंशी जी के पार्थिक शारीर को लेकर अपने गाँव चले गए।
एक आम आदमी कि मृत्यु हो गई। जो पूरी जिन्दगी दुसरे का काम करते हुए गुजार दी, अपने लिए अपने बच्चो के भविष्य के लिए कुछ भी नहीं किया था। उसके सामने उसकी पूरी जिम्मेदारियां और जबाबदेहियाँ पड़ी कि पड़ी रह गई और वो इस दुनियाँ से कूच कर गया। उसके तीन छोटी मासूम बच्चियाँ, बेटा और पत्नी सभी अनाथ हो गए। अब उसके बच्चो का क्या होगा ?
यह मेरी एक छोटी सी श्रधांजली है उस नेक ईमानदार और कर्मशील व्यक्ति को है जो झोपड़े में जिंदगी गुजारी, अपने बच्चो के भविष्य के लिए कुछ नहीं किया लेकिन अपने मालिक के लिए आलीशान महल खड़ा किया

Thursday, November 25, 2010

काम को इनाम (बिहार चुनाव परिणाम)

बिहार विधान सभा चुनाव परिणाम में एनडीए को तीन चौथाई बहुमत का मिलना यह जताता है कि "जो सरकार काम करेगी वही राज करेगी"। पिचले पांच सालों में एनडीए कि सरकार ने बिहार में जो काम किया उसके एवज में बिहार के लोगों ने जातिवाद की रेखा को पार कर अपने मताधिकार का प्रयोग कर एक ऐसे गठबंधन पार्टी को पूर्ण जनादेश दिया जो पिचले पांच वर्षो में काम कर बिहार को जंगल राज से उबार एक ऐसे रास्ते पर अग्रसर किया जहाँ से बिहार की अपनी पहचान बनानी शुरू हुई। आज बिहार की जो गरिमा बनी है वह पिछले एनडीए सरकार की देन है।
अगर हम पिछले पांच वर्षों को छोड़ दें और उसके पीछे के पंद्रह वर्षों के अतीत में झांके तो एक बदहाल बिहार नज़र आता है। जहाँ उंच-नीच का वेदभाव, जाति-जाति में टकराव, नक्सलवाद का बोलबाला, फलता-फूलता अपहरण उद्योग, अपराधिक एवं राजनितिक सांठ-गाँठ, अपराधिक तत्वों का बोलबाला, ला एंड आडर का बुरा हाल, जर्जर सड़कें, सरकारी हस्पतालों का बुरा हाल, शिच्छा के स्तर का मटियामेट होना, बंद पड़े उद्योग धंधे, जीने का आधार ख़त्म (तभी तो हर तबके का पलायन हुआ बिहार से) यानि पूरी तरह बर्बाद बिहार नज़र आता है।
फिर आता है २००५ का बिहार विधान सभा चुनाव। धन्य हो चुनाव आयोग की टीम धन्य हो श्री के.जे.राव जिनकी सक्रियता के चलते बिहार में निष्पच्छ चुनाव हो सका और एनडीए की सरकार सत्ता में आ सकी। अगर चुनाव आयोग के पहल में कही भी थोड़ी सी भी त्रुटी होती तो फिर से आरजेडी की सरकार सत्ता पर काबिज़ होती और बिहार में फिर वही सब होता जो पिछले पंद्रह सालों तक होता रहा था।
बिहार विधान सभा चुनाव २००५ में एनडीए की सरकार श्री नितीश कुमार की अगुवाई में बनी। पूरी तरह से बर्बाद बिहार को एक नया आयाम देने के लिए नितीश कुमार ने कमर कस ली। उन्होंने बिहार के लिए कुछ सपने पाल रखे थे और फिर उन सपनो को साकार करने में जुट गए। वह पिछली सरकार की नीतियों पर न चल कर खुद की बनाई नीतियों पर चलना शुरू किया। जिसमे शामिल था बिहार में कानून का राज, ताकि लोग अमन चैन से जीवन बसर कर सके, सड़कें जो पूरी तरह बर्बाद हो चुकी थी उसे ठीक करना, सरकारी हस्पतालों की जर्जर स्थिति से ऊपर उठाना, आधी आबादी (महिला) को उनका हक देना, शिच्छा के स्तर को ऊपर उठाना, बिहार में बाहरी उद्योगपतियों को आकर्षित करने के लिए एक अच्छा माहौल बनाना, बिजली उत्पादन को बढ़ाना तथा आत्म निर्भर बनना, बिहार के लोगों को रोज़गार धंधे मुहैया करना (ताकि बिहारियों का पलायन रुक सके), उच्च शिच्छा के लिए बिहार में ज्यादा से ज्यादा कालेज एवं यूनिवर्सिटी का खुलवाना ताकि उच्च शिच्छा प्राप्त करने के लिए बिहार से बिहारी लड़कों का पलायन रुक सके।
श्री नितीश कुमार ने पिछले पांच वर्षो में अपने बनाये सभी नीतियों पर पूरी तरह अमल करते हुए एक पिछड़े राज्य को अग्रसर राज्य कि श्रेणी में लाये और बिहार विकाश के राह पर पूरी तरह दौड़ने के लिए तैयार हो गया है। इसीलिए बिहार कि जनता ने भी उम्मीद से ज्यादा जनादेश (विश्वाश) देकर श्री नितीश कुमार के हाथो में बिहार कि बाग डोर थमा दी क्यों कि अपने से ज्यादा उसे नितीश कुमार पर विश्वाश है।
अब मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार अपने गढ़े हुए सपनो का बिहार बनाने के लिए स्वतंत्र है क्यों कि उनके राह में अब विपच्छ भी नहीं है।


Sunday, November 14, 2010

छेत्रिय पार्टियों की चांदी ही चांदी


भारतीय राजनीत में छेत्रिय पार्टियों का घुसपैठ तेजी से बढ़ता जा रहा है जिसका खामियाजा देश को भुगतना पड रहा है क्यों कि किसी भी राष्ट्रिय पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण सरकार बनाने के लिए उसे छेत्रिय पार्टियों से किसी भी स्तर पर समझौता करना पड़ता है चाहे वो केंद्र में मंत्री पद ही क्यों न हो? आज बहुत सी छोटी-छोटी छेत्रिय पार्टियों कि संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। इन छेत्रिय पार्टियों का निर्माण वैसे लोगों ने किया है जो अति- महत्वाकानच्छी है तथा जनता में उनकी पैठ है। वो राज्य में अपनी सरकार किसी भी सूरत में बना तो लेते है लेकिन केंद्र में वो पंद्रह, बीस या पच्चीस सांसद ही भेज पाते है, नतीजा वही होता है कि कोई भी राष्ट्रिय पार्टी सरकार बनाने भर बहुमत नहीं जुटा पाती है जिसके चलते छेत्रिय पार्टियों से हाथ मिलनी पड़ती है या यूँ कंहे कि छेत्रिय पार्टियाँ केंद्र कि सत्ता में अति महत्त्वपूर्ण पद पाने के लिए ब्लैक-मेलिंग शुरू कर देती है। एन-केन-प्राकेन किसी भी तरह मंत्री पद हांसिल करने के बाद जनता के पैसों कि लूट शुरू होती है। ये छेत्रिय पार्टियाँ समाज सेवा या देश को आगे बढ़ाने कि भावना से पार्टी का निर्माण नहीं करते बल्कि इसके पीछे एक ही मकसद होता है कि इतने सांसद जीत जाएँ जिससे केंद्र में सरकार बनाने में सहयोग कर सकें और मंत्री पद मिले फिर तो जनता के पैसों को लूटना ही है और अगर चोरी पकड़ी भी जाती है या मंत्री पद छोड़नी भी पड़ती है तो सरकार को अल्प-मत में तो ला ही देंगे, मतलब "चोरी भी और सीनाजोरी भी" । यह छेत्रिय पार्टियाँ अब ब्लैक-मेलरों, चोरों और उच्चकों कि पार्टियाँ बनती जा रही है और इसमें तमाम वैसे लोग जुड़े है जो जनता के खजाने कि चाभी हांसिल करना चाहते है।
भारत कि आज़ादी के बाद से केंद्र और राज्य में कांग्रेस पार्टी कि सरकार ज्यादातर सत्ता में रही है और शायद इसकी गलत नीतियों के कारण ही छेत्रिय पार्टियों का जन्म हुआ। पहले तो यह छेत्रिय पार्टियाँ भारत के दबे कुचले गरीब लोगों कि आवाज़ बनी तथा जनता का भी भरपूर समर्थन इन छेत्रिय पार्टियों को मिला जिसके चलते ये सत्ता कि सीढियाँ चढ़ते गए। सत्ता में आने के बाद पद,पावर और पैसा तीनो मिला। शायद पद,पावर और पैसा ये तीनो मिलते ही छेत्रिय पार्टिया दिशाहीन हो गई और सत्ता के खेल के ये माहिर खिलाडी बनते गए जो किसी भी रूप में सत्ता के करीब रहना इनके फितरत में शामिल होता गया। सत्ता के करीब रहने के लिए ढेर सारे पैसो कि जरुरत पड़ती है इसलिए मंत्री पद मिलते ही ये जनता के पैसो को लूटना शुरू कर देते है। खुदा ना खास्ता अगर चोरी पकड़ी भी जाती है तो इनके समर्थन में वही बड़ी सत्ता धारी पार्टी खड़ी हो जाती है, क्यों कि ये मंत्री भी तो उसी के सरकार में है और यही शुरू होता है पद का दुरूपयोग।
आज केंद्र कि सरकार में जनता के पैसो का कैसे चुना लगाया जा रहा है इसके मिसाल है दूर संचार मंत्री ऐ राजा। जिन्हों ने टू जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाला में जनता के १.७६ लाख करोड़ रूपया का चुना लगाये है तथा इन पर ७० हजार करोड़ रूपये के घोटाले का आरोप है। ऐ राजा छेत्रिय पार्टी द्रमुक से सांसद है तथा जिसके संचालक एम्.करूणानिधि है। केंद्र में कांग्रेस पार्टी कि सरकार है और ऐ राजा इन्ही कि सरकार में दूर संचार मंत्री है। कांग्रेस कि महानता देखिये कि अपने पद का दुरूपयोग करने के बाद भी ऐ राजा मंत्री पद त्यागने को तैयार नहीं थे और कांग्रेस भी उनपर दबाव नहीं डाल पा रही थी क्यों कि द्रमुक के समर्थ से ही केंद्र कि सत्ता में कांग्रेस बैठी है और अगर द्रमुक अपना समर्थन वापस ले लेती तो कांग्रेस अल्प-मत में आ जाती, इसलिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कांग्रेस अध्यच्छ श्रीमती सोनिया गाँधी तथा वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने रविवार सुबह राजा मामले पर उपजे संकट पर गहन मंत्रणा कि थी और अपने महानता का परिचय देते हुए कांग्रेसी वित्तमंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने एम्.करूणानिधि से बात कि और स्पस्ट तौर पर बता दिया कि अब पानी सर के ऊपर बह रहा है इसलिए राजा को मंत्रिमंडल में बनाये नहीं रखा जा सकता है इसलिए राजा अपने पद से इस्तीफा दे और यह दूर संचार विभाग आप ही के सुपुर्द करता हूँ राजा कि जगह किसी और को यह मंत्री पद दे दे ताकि केंद्र सरकार पर आये इस संकट को दूर किया जा सके। धन्य हो एम्.करूणानिधि का जिनके कहने पर राजा ने मंत्री पद से त्यागपत्र दिए। मतलब जो घोटाला हुआ है उसे लिपा-पोती किया जा सके।

Thursday, November 11, 2010

लालच बुरी बला (कौन बनेगा करोडपति)


सोनी टीवी पर रात्रि नव बजे सोमवार से वृहष्पतिवार तक महानायक अमिताभ बच्चन द्वारा प्रस्तुत "कौन बनेगा करोडपति" का प्रसारण हो रहा है। इसमे हर सवाल का चार जबाब कम्प्यूटर पर दिखाए जाते है जिसमे से एक जबाब सही होता है, इन्ही सही जबाबों को देते हुए प्रतिभागी रकम दर रकम जीतते हुए आगे बढ़ते है और यह रकम हर सही जबाब के बाद दुगनी होती जाती है। खेल पांच करोड़ के रकम तक जाकर समाप्त हो जाती है। महानायक अमिताभ बच्चन कि प्रस्तुति में महानता झलकती है, वो हर प्रतिभागी को प्रोत्साहित करते नज़र आते है और ज्यादा से ज्यादा रकम प्रतिभागी को जीतते देखना चाहते है। तरह-तरह के लोग उनके सामने वाली हॉट सीट पर बैठते है और उनके द्वारा पूछे गए सवालों का जबाब देते है। इसी हॉट सीट पर मेरठ से आये प्रतिभागी "प्रशांत बातर" भी बैठते है और अमिताभ बच्चन द्वारा पूछे गए सवालों का सही जबाब देते हुए एक करोड़ कि राशी तक जीत जाते है। फिर आता है इस खेल का आखरी पांच करोड़ का जैकपॉट सवाल। इस खेल का रोमांचक पहलु।
अमिताभ बच्चन प्रशांत बातर से कहते है "अगर इस सवाल का सही जबाब आपको मालूम हो तब ही खेलिएगा, अगर जबाब नहीं मालूम हो तो खेल को बीच में छोड़ कर जा सकते है, क्यों कि आप एक करोड़ रुपये जीत चुके है" । शायद प्रशांत बातर अमिताभ बच्चन द्वारा कही हुई बातो पर पूरी तरह ध्यान नहीं देते है तभी तो वो अमिताभ जी से एक मिनट का समय मांगते है गणेश भगवान को ध्यान लगाने के लिए। अमिताभ जी उनको दो मिनट का समय देते है। गणेश जी को ध्यान लगाने के लिए। ध्यान ख़त्म होने के बाद प्रशांत बातर खेल को आगे खेलने का इक्छा जाहिर करते है और गेम खेलना शुरू करते है।
कौन बनेगा करोड़पति का आंखरी सवाल कंप्यूटर पर चार ज़बाब जिसमे से एक ज़बाब सही तीन गलत, प्रशांत बातर के पास एक आप्सन डबल डीप, अमित जी फिर कहते है अगर आपको सही ज़बाब मालूम हो तब ही खेलिएगा, लेकिन प्रशांत बातर डबल डीप का उपयोग करने के बावजूद भी सही ज़बाब नहीं दे पाते है और तीन लाख बीस हज़ार रुपया ही जीत पाते है। मतलब कि एक करोड़ रुपया जीत जाने के बाद भी प्रशांत बातर आंखरी सवाल का ज़बाब देते है जब कि उनको सही ज़बाब नहीं मालूम है अमिताभ बच्चन के बार-बार कहने पर भी वह ध्यान नहीं देते है। यह लालच कि पाराकाष्टा कही जाएगी या ना-समझी।
यह लालच ही है जो प्रशांत बातर के सोंचने समझने कि क्रिया पर पूरी तरह हावी हो गया और अच्छी-खासी जीती हुई रकम गँवा बैठे।
प्रशांत बातर के हार से हम सभी को एक सबक मिलती है " अति लालच बर्बादी का कारण"

Wednesday, October 27, 2010

मतगणना बाद बिहार कि किस्मत का फैसला

मतगणना के बाद बिहार कि किस्मत का फैसला आने वाला चुनाव परिणाम तय करेगा। क्यों कि बिहार में दो ही पार्टियों के बीच सीधा संघर्ष है।
- एन डी जिसमे जनता दल यु और बीजेपी का गटबंधन है।
- आरजेडी और लोजपा का गटबंधन है।
कांग्रेस पार्टी तीसरे स्थान पर रहेगी और वह बिहार में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएगी।
बिहार विधान सभा चुनाव २०१० विकाश बनाम जातिवाद का सीधा संघर्ष है। चुनाव परिणाम आने के बाद ही यह तय होगा कि बिहार में विकाश कि जीत हुई या जातिवाद कि।
अगर विकाश कि जीत होती है तो एन डी ए कि सरकार फिर से सत्ता में आएगी और पिछले पांच सालो में जो विकाश कार्य हुए है वह और आगे बढेगा तथा बाहरी उद्योगपतियों का आने का रास्ता प्रसस्त होगा। तब अगले पाँच साल में बिजली कि समस्या, रोजगार कि समस्या, विद्यालय एवं महाविद्यालय कि समस्या, सरकारी हस्पतालों कि समस्या, गाँव-गाँव तक सड़के पहुँचाने कि समस्या, ला एंड ऑडर और दुरुस्त करने कि समस्या तथा आवागमन के रास्ते को और सुचारू गति प्रदान करने कि समस्या से बिहार को पूरी तरह से न भी सही लेकिन निजाद मिलेगी।

अगर आरजेडी और लोजपा कि सरकार बनती है तो जातिवाद कि जीत होगी। शुरू के दौर में सब कुछ ढहर सा जायेगा और लोग सरकार कि नीतियों का आकलन करेंगे, शायद इस आकलन में डेढ़ या दो साल का समय लग जाये। अगर सरकार कि नीतियाँ जनता के प्रति, राज्य के प्रति, विकाश के प्रति माकूल रहा तो फिर जनता लालू प्रसाद और रामविलास पासवान के प्रति अपने विश्वास को बना पायेगी। अगर लालू प्रसाद और रामविलास पासवान जनता को जो उम्मीदे दिए है उस पर सही नहीं उतरते है तो यह लालू प्रसाद और रामविलास पासवान के लिए आंखरी चुनाव साबित होगा। पिछले पंद्रह साल तक आरजेडी कि सरकार बिहार कि सत्ता में रही है लेकिन बिहार को कोई दिशा नहीं दे पाई थी बल्कि इनके शासन-काल में बिहार कि दशा और ख़राब हुई। इस चुनाव में अगर लालू प्रसाद और रामविलास पासवान कि पार्टी बिहार कि सत्ता में आती है तो शायद अपने पिछले गलतियों से सबक लेते हुए आगे विकाश के कार्यों पर ध्यान देंगे तथा बिहार को एक सही दिशा देंगे।
आज़ादी के बाद से बिहार कि सत्ता चालीस वर्षो तक कांग्रेस के हाथ में रही लेकिन विकाश के नाम पर बिहार बाटम लाइन पर रहा और बिहार में जो विकाश होना चाहिए वह नहीं हुआ। कांग्रेस के शासन से त्रस्त होकर यहाँ कि जनता श्री लालू प्रसाद के पक्छ में अपना जनादेश दिया। लालू प्रसाद पंद्रह साल तक बिहार कि सत्ता में रहे लेकिन इन्हों ने भी बिहार के विकाश पर कोई ध्यान नहीं दिया, बल्कि इनके शासन काल में बिहार कि स्थिति और ख़राब हुई। लालू प्रसाद के शासन से त्रस्त होकर बिहार कि जनता एनडीए (जनता दल यु + बीजेपी) को अपना जनादेश दिया। बिहार में एनडीए कि सरकार सत्ता में आई और मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार बने। सत्ता में आने के साथ ही इन्हों ने बिहार के ला एंड ऑडर को दुरुस्त किया, कानून का राज कायम होने से यहाँ के वाशियों को सकून मिला। फिर उन्हों ने पूरी तरह बर्बाद हो गई बिहार कि सड़कों पर ध्यान दिया, सड़कें बहुत हद तक अच्छी हुई तथा कुछ नई सड़कें भी बनी। जजर हालत में पहुँच चुकी सरकारी हस्पतालों को बहुत हद तक ठीक किया तथा डाक्टरों कि उपस्थिति अनिवार्य हुई जिससे मरीजों कि तायदात में वृद्धि हुई साथ ही मुफ्त कि दवाएं भी मिलने लगी। बिहार के स्कूलों में लड़के लड़कियों कि संख्या में कुछ ज्यादा ही वृद्धि हुई क्यों कि सरकार के तरफ से मुफ्त में साईकिल एवं स्कुल यूनिफार्म बांटे गए।

सरकार किसी कि भी बने बिहार कि समस्याओं से उसे रु-बरु होना पड़ेगा और उसके लिए पहल करनी पड़ेगी :- ला-एंड- आडर का और दुरुस्त होना, विद्यालय, महाविद्यालय को बहुतायात में खोलना पड़ेगा ताकि बिहारी बच्चे उच्च शिक्झा के लिए दुसरे राज्यों में न जाएँ। बिजली कि समस्या से बिहार को उबारना पड़ेगा ताकि कल-कारखाने खुल सके और लोंगो को रोजगार मुहैया हो सके। कृषि को उद्योग का दर्जा देना पड़ेगा जिससे किसान संपन्न हो सके और मजदूरों का पलायन रुक सके। सड़कें गाँव-गाँव तक बनानी पड़ेगी ताकि लोंगों का आवा-गमन सुचारू रूप से हो सके। उत्तर बिहार में हर साल जो बाढ़ के रूप में कहर आता है और गाँव का गाँव उस बाढ़ में बह जाता है उस बाढ़ के पानी को रोकने के लिए डैम बनवाने पड़ेंगे जिससे पन-बिजली का उत्पादन भी होगा और बाढ़ का पानी खेंतो में सिचाई के काम भी आएगा। गाँव-गाँव तक सरकारी हस्पताल खोलने होंगे ताकि गाँव का कोई भी व्यक्ति बिना इलाज के न मर सके।
बिहार में जब रोजगार मिलने लगेगा तो लोंगो का पलायन अपने-आप रुक जायेगा, हर माह जो करोडो रुपये दुसरे राज्यों को चले जाते है उच्च शिझा के नाम पर वह पैसा बिहार में ही रहेगा, बिहार में सम्पन्नता आएगी, बिहार आत्म निर्भर बनेगा, मावोवाद भी धीरे-धीरे ख़त्म हो जायेगा तथा मावोवादी भी आम लोगों कि तरह जिंदगी बसर करने लगेंगे। यह सब संभव है बसरते कि इस राज्य के बनने वाले मुखिया इन बातो पर अमल करें।

Monday, October 25, 2010

भीड़ जुटाता उड़न खटोला (बिहार विधान सभा चुनाव)

बिहार विधान सभा चुनाव में उड़न खटोला (हेलीकाप्टर) का प्रयोग धड़ल्ले से सभी पार्टियाँ अपने चुनाव प्रचार में कर रही है, चाहे वो कांग्रेस पार्टी हो या राजद, लोजपा हो या बीजेपी, जनता दल यू हो या बसपा ये सभी पार्टियों ने चुनाव से पहले ही चुनाव प्रचार के लिए उड़न खटोले (हेलीकाप्टर) कि व्यवस्था या बुकिंग कर लिए थे। हेलीकाप्टर के प्रयोग से हमारे राजनेताओं को दो फायदे मिले है , पहला .... ज्यादा से ज्यादा सभाओं को संबोधित करने का समय मिला, दूसरा.... ग्रामीण छेत्रो में हेलीकाप्टर देखने के लिए आये लोंगो की भीड़ क्यों की आज हेलीकाप्टर भीड़ जुटाने का एक सशक्त माध्यम बन कर उभरा है। आज के नेतावों में अब आकर्षण नहीं रहा जो भीड़ जुटा सके। पहले नेता के नाम पर लोंगो की भीड़ जुटती थी और वो नेता मोटर गाड़ी से यात्रा कर अपनी सभाओ को संबोधित करते थे ऐसा नहीं की आज विधान सभा का छेत्रफल बडा हो गया है या भारत की सीमाएं बढ़ गई है जो चुनाव प्रचार के लिए हेलीकाप्टर (उड़न खटोला) की जरुरत बनी है बल्क्ति हुआ ये है की ना ही विधान सभा का छेत्रफल बढ़ा है ना ही भारत की सीमाएं बढ़ी है बल्कि हमारे राज नेताओं ने अपने आकर्षण को खो दिया है अब उनमे वो आकर्षण या भाषण में वह दम नहीं रहा जो लोंगो को प्रभावित कर सके या उनके नाम पर भीड़ जुट सके आज यही कारण है कि सभी पार्टियों को लोंगो की भीड़ जुटाने के लिए हेलीकाप्टर (उड़न खटोला) ,फिल्म अभिनेता या क्रिकेट खिलाडी कि जरुरत पड़ती है ताकि ज्यादा से ज्यादा भीड़ को जुटाया जा सके
अब वैसे भीड़ को जुटाने से फायदा क्या जो हेलीकाप्टर देखने या फिल्म अभिनेता को देखने आई है हेलीकाप्टर देखने वाली भीड़ हेलीकाप्टर देखेगी वो नेता द्वारा दिए हुए भाषण पर ध्यान नहीं देगी हाँ फिल्म अभिनेताओं से एक फायदा और होता है उनके नाम पर लोंगो कि भीड़ भी जुटती है और उनके द्वारा दिए भाषण को जनता सुनती भी है लेकिन अभिनेतावों द्वारा दिए हुए भाषण का छनिक ही प्रभाव लोंगो के मन मस्तिष्क पर रहता है क्यों कि वह राजनेता नहीं है बल्कि फिल्म अभिनेता है
हमारे राजनेता बिहार जैसे गरीब प्रदेश में हेलीकाप्टर (उड़न खटोला) का इस्तमाल कर वैसे गाँव के लोंगो के बीच भाषण देने पहुंचते है जहाँ सही तरीके से तन पर कपडा नहीं है हीं पेट में अन्न का दाना, मेहनत मजदूरी कर एक वक्त का खाना जुटा पाना जहाँ मुस्किल है वैसे जगहों पर ये राजनेता हेलीकाप्टर का इस्तेमाल करते है। क्या ये गरीबो का या गरीबी का माखौल नहीं उड़ा रहे है। यह गरीबी और पिछड़ापन ही है जहाँ कोसो दूरी तय कर गाँव के लोग हेलीकाप्टर देखने आते है और विडम्बना यह की भीड़ को देख राजनेता यह समझते है कि भाषण सुनने के लिए लोग आये है।

Saturday, October 23, 2010

आपन डफली आपन राग

बिहार विधान सभा चुनाव प्रचार में सभी पार्टियों के नेता अपने-अपने तरीके से अपने पार्टी कि बाते जनता के सामने रखी है।

आरजेडी सुप्रीमो श्री लालू प्रसाद.... जनता कि सरकार जनता के लिए बनाने कि बात करते है तथा पिछले पंद्रह सालों में जो विकाश का काम बिहार में नहीं किये थे वो चुनाव में जितने के बाद विकाश करने कि बात करते है इसीलिए अपने भाषण में यह बार-बार कह रहे है .... जैसे मैंने भारतीय रेल को चमकाया और दुनियाँ देखती रह गई उसी तरह मै बिहार को चमकाउंगा। शायद लालू जी अपने पिछली गलतियों से तौबा कर लिए है इसीलिए बिहार में विकाश कि बात करते है। "अब पछताना क्या जब चिड़ियाँ चुंग गई खेत"

लोजपा सुप्रीमो श्री रामविलास पासवान .... ये भी बिहार में विकाश करने कि बात कहते है साथ ही जनता के बीच अपने दिए गए भाषणों में बहुत सारी उम्मीदे दे रहे है जैसे - पच्चास हजार रुपया हर गरीब व्यक्ति को दिया जायेगा जिसका सूद नहीं लगेगा, हर गरीब व्यक्ति को घर बनाने के बारह डिसमिल जमीन मुफ्त में दिया जायेगा तथा बी तक कि पढाई और पुस्तक मुफ्त में दिया जायेगा। इनके भाषण में केवल आश्वाशन ही आश्वाशन है।

जनता दल यू के श्री नितीश कुमार (वर्तमान मुख्यमंत्री बिहार) .... ये केवल बिहार के विकाश कि बात कर रहे है। जनता के बीच अपने दिए भाषणों में पांच साल तक अपने द्वारा किये हुए कामो का मजदूरी (वोट) मांग रहे है। हाँ यह सही है कि ये मजदूरी (वोट) पाने के हकदार है, क्यों कि पूरी तरह बर्बाद बिहार को इन्हों ने आबाद किया है, विकाश कि गाड़ी को पटरी पर ला दिए है अब इसका दौड़ने का समय है और वह अगला पांच साल होगा जिसमे विकाश कि गाड़ी दौड़ेगी। इसलिए अगर विकाश कि गाड़ी को दौड़ना है तो नितीश कुमार को मजदूरी (वोट) देनी ही होगी।

भाजपा के श्री सुशिल कुमार मोदी (वर्तमान उप-मुख्यमंत्री बिहार) ....... ये भी बिहार में विकाश कि बात कर रहे है या भजपा के जितने भी नेता बिहार रहे है वो जनता के बीच अपने भाषण में केवल विकाश कि बात कहते है, क्यों कि जे डी यू और बीजेपी ने मिल कर इस विकाश कि गाड़ी को आगे बढाया है। इसलिए बीजेपी और जे डी यू ये दोनों पार्टियाँ मजदूरी (वोट) पाने का हक रखती है। इसलिए विकाश कि गाड़ी को दौड़ाने के लिए इनको मजदूरी (वोट) देना ही पड़ेगा।

कांग्रेस पार्टी (वर्तमान में केंद्र कि सत्ता पर आशिन) ..... यह पार्टी भारत कि सबसे पुरानी राजनितिक पार्टी है भारत के बहुत से राज्यों में इसकी सरकार है तथा केंद्र में भी इसी पार्टी का शासन है। इस पार्टी के बड़े से बड़ा नेता अपने भाषणों में विकाश कि कोई बात नहीं कर रहे है ना ही जनता के बीच कोई आश्वाशन दे रहे है ना ही यह बता रहे है कि बिहार कि सत्ता में आने के बाद वह बिहार को किस रास्ते पर ले जायेंगा , चाहे वो कांग्रेस अध्यच्छ श्री मति सोनिया गाँधी हो या उनके पुत्र राहुल गाँधी, प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह या दिल्ली कि मुख्यमंत्री शिला दीक्षित, सचिन पायलट, जायसवाल साहब ये सभी राजनेता मुद्दा विहीन भाषण दे रहे है, अगर इनके पास कोई मुद्दा है तो बस एक मुद्दा है ..... केंद्र के पैसे से बिहार का विकाश हुआ, केंद्र के पैसे को नितीश कुमार अपना पैसा बता रहे है।

लगता है केंद्र अलग है और बिहार अलग है या बिहार भारत का अंग नहीं है या बिहार का पैसा टैक्स के रूप में केंद्र को नहीं जाता है जो हाय तौबा ये लोग मचाये है कही यह तो नहीं ..... केंद्र द्वारा दिए हुए पैसे को कांग्रेस अपना पैसा तो नहीं समझ रही है जो कांग्रेस के हर नेता अपने भाषण में पैसे का ही जिक्र कर रहा है

खैर कुछ भी हो बिहार में विकाश तो हुआ है चाहे वह बिहार के पैसे से हुआ हो या केंद्र के पैसे से हुआ हो, क्यों कि आज हर पार्टी के नेता यह स्वीकार कर लिए है कि बिहार में विकाश हुआ है। तो क्यों नहीं सभी पार्टियाँ एक साथ मिल कर बिहार में विकाश कि गाड़ी को और तेज रफ़्तार देने में मदद करे। एक दुसरे का टांग खीचने से राज्य का या देश का विकाश नहीं हो सकता है। अगर कोई व्यक्ति अच्छा काम करता है तो उसे और बढ़ावा देना चाहिए ताकि वो और अच्छा काम करे।

Friday, October 22, 2010

अब विकाश कि लहर चलने वाली है

बिहार का चुनाव क्या हो रहा है सभी छोटे बड़े राजनेताओं कि जुबान पर बस विकाश का ही मुद्दा छाया हुआ है अब हर नेता अपनी जनसभा में केवल विकाश कि बात कर रहा है चाहे वह कांग्रेस हो, आर.जे.डी हो, लोजपा हो, बीजेपी हो, जे.डी.यू हो या कमनिष्ट पार्टी हो, सभी एक ही राग अलाप रहे है और वह है "विकाश"
देर से ही सही अब राजनीतिक पार्टियों को यह लगने लगा है कि भारत कि जनता को बहुत दिनों तक बेवकूफ बना लिया है चाहे वह जाती के नाम हो, धर्म के नाम पर हो या गरीबी के नाम पर हो, लेकिन अब भारतीय जनता को ये राज नेता और बेवकूफ नहीं बना सकते क्यों कि आज कि ७० फीसदी नौजवान पीढ़ी पढ़ी-लिखी और सुलझी हुई है यह २१ वीं शदी कि पीढ़ी है यह जाती, धर्म से ऊपर उढ़ कर सोंचती है आज कि युवा पीढ़ी दिल का नहीं दिमाग का इस्तेमाल करती है अब पढ़े लिखे मुसलमान नौजवान पीढ़ी अपने को अल्प-संख्यक कहलाना पसंद नहीं करते है क्यों कि अल्प-संख्यक शब्द उनको गाली लगता है, वो भी भारतीय है तो अल्प-संख्यक क्यों कहा जाता है यह चेतना पढ़े-लिखे नौजवान पीढ़ियों में आई है यह पीढ़ी अपने राज्य अपने सूबे में विकाश चाहती है, अब यह पीढ़ी राजनेतावों के चिकनी-चुपड़ी बातो में नहीं आने वाली है, आज कि युवा पीढ़ी समझदार पीढ़ी है इसीलिए अब सभी राजनीतिक पार्टियाँ भी अपना स्टैंड बदलने लगी है और विकाश कि बाते करने लगी है क्यों कि अब उन्हें भी यह समझ आने लगा है कि बात बनाने से वोट नहीं मिलने वाला है, काम के बदले ही वोट मिलेगा, इसलिए विकाश कि बाते करने लगे है
राज्य के विकाश के मुद्दे कि शुरुआत भी बिहार से ही हुआ जैसे कि देश कि आज़ादी कि शुरुआत गाँधी जी ने बिहार कि धरती से ही किये थे, एक बिहारी ने पुरे भारत से कांग्रेस कि सत्ता को उखाड़ फेंका था वह जयप्रकाश नारायण बिहार से ही थे और राज्य के विकाश का मुद्दा एक बिहारी ने ही उठाया है वह बिहार के वर्तमान मुख्य-मंत्री नितीश कुमार है विकाश कि बाते अभी बिहार में हो रही है लेकिन जैसे-जैसे भारत के और राज्यों में चुनाव आएगा वहां कि जनता भी विकाश कि ही बात करेगी तथा विकाश ही चुनावी मुद्दा बनेगा अभी तो यह शुरुआत है आगे-आगे देखिये होता है क्या ? विकाश कि लहर चल पड़ी है अब इसके आंधी में पूरा देश, देश कि पूरी जनता कि एक ही आवाज़ होगी और वह आवाज़ होगी ......"विकाश" केवल विकाश हर सूबे में विकाश हर राज्य में विकाश पुरे देश में विकाश, अब आम जनता अपने सरकार से सिर्फ विकाश चाहेगी अब राजनेतावों कि कि चिकनी-चुपड़ी बाते जनता को दिग्भ्रमित नहीं कर पायेगी अब राजनेतावों को जनता काम के बदले अपना वोट देगी समय रहते राजनेतावों को सम्हल जाना चाहिए क्यों कि अब पढ़े-लिखे वोटरों से राजनेतावों का पाला पड़ने वाला है अब राजनेतावों के दिन बदलने वाले है काँटों भरे रास्ते से इनको गुजरना होगा क्यों कि २१वीं शदी कि पीढ़ी पढ़ी-लिखी पीढ़ी है यह अपने एक एक पैसे का हिसाब राजनेतावों से लेगी
बिहार के चुनाव में विकाश मुख्य मुद्दा उभर कर सामने आया है .... नितीश कुमार विकाश कि बाते करते है तो बात समझ में आती है क्यों कि उन्हों ने सूबे में थोडा ही सही विकाश कि गाड़ी को पटरी पर ला तो दिए है अगर लालू जी विकाश कि बात करते है तो बेमानी लगता है क्यों कि उन्हों ने पंद्रह साल में बिहार में कोई विकाश नहीं किये और पासवान जी ये तो केवल केंद्र में मंत्री रहे है इनके लिए तो पूरा भारत एक है तो फिर बिहार जैसे एक राज्य को ये क्या अहमियत देंगे, अब रही कांग्रेस पार्टी ये विकाश कि बात तो कर ही नहीं रही है इसके सभी बड़े नेता केवल एक ही राग अलाप रहे है .... केंद्र के पैसे से बिहार का विकाश हुआ है

Sunday, October 17, 2010

"किसे वोट दे" बिहार चुनाव

बिहार में चुनावी जंग छिड़ी है सभी पार्टियाँ अपने-अपने तरीके से चुनावी प्रचार शुरू कर दिए है. सभी पार्टियों के दिग्गज नेता कमर कस कर चुनावी मैदान में उतार चुके है और अपने-अपने तरीके से जनता को प्रभावित या गुमराह करने लगे है। इलेक्ट्रोनिक मिडिया वाले भी चुनावी प्रचार कि कवरेज ज्यादा से ज्यादा दिखाने कि कोशिश कर रहे है तथा "अगला मुख्य-मंत्री कौन" का सर्वे भी शुरू कर दियें है। एक मीडिया हाउस द्वरा कराये गये सर्वेक्षण में मुख्यमंत्री पद के अन्य दावेदारों में राजद नेता लालू यादव को मात्र १७ फीसद, लोजपा नेता रामविलास पासवान को फीसद, राबड़ी देवी को फीसद और भाजपा नेता सुशील मोदी को फीसद लोगों ने स्वीकार है ।जबकि नीतीश कुमार ६६ फीसदी लोगों की पहली पसंद हैं | ’सहारा न्यूज नेटवर्कके इस सर्वेक्षण में राज्य के तकरीबन सभी विधानसभा क्षेत्रों को शामिल किया गया था.
कांग्रेस पार्टी के महा-सचिव राहुल गाँधी, प्रधान-मंत्री मनमोहन सिंह तथा कांग्रेस अध्यक्छ श्री मति सोनिया गाँधी ने बिहार में विकाश का श्रेय केंद्र द्वारा अधिक पैसा दिया जाना बताते है। यह अच्छी बात है कि केंद्र ने बिहार को ज्यादा पैसा दिया जो बिहार के विकाश के कार्य में लगा, तो फिर पिछले चालीस वर्षों तक बिहार कि सत्ता कांगेस के हाथो में थी तब बिहार में विकाश क्यों नहीं नज़र आया ? मतलब साफ है कि कांग्रेस पार्टी के किसी भी मुख्य-मंत्री में बिहार के विकाश को लेकर कोई सपना या इच्छाशक्ति नहीं थी या फिर उनको कार्य करने कि शैली नहीं आती थी जिसके चलते बिहार का विकाश नहीं हो पाया....... तो फिर हम कांग्रेस को वोट क्यों दे ? यह सभी को मालूम है कि केंद्र में जिसकी सरकार है उसी कि सरकार अगर राज्य में है तो उस राज्य को वितीय सहायता ज्यादा मिलाती है अगर किसी राज्य में दुसरे पार्टी कि सरकार है तो उसके हक के बराबर ही वितीय सहायता मिलाती है उससे ज्यादा नहीं ? तो फिर यह कांग्रेस बार-बार क्यों कहती है कि बिहार को केंद्र द्वारा वितीय सहायता ज्यादा दिया गया है ? जब कि केंद्र में कांग्रेस कि सरकार है और बिहार में NDA की सरकार है।
पिछले पंद्रह साल तक राष्ट्रिय जनता पार्टी [RJD] कि सरकार बिहार में थी उस समय-अवधी में भी बिहार में कोई विकाश नहीं हुआ, बल्कि वह पंद्रह साल बिहार के काले अध्याय के सामान था उसी समय-काल में बिहार से बिहारियों का पलायन सबसे ज्यादा हुआ था , यहाँ के बच्चे उच्च शिझा के लिए दुसरे राज्यों में पढने के लिए गए, बिहार कि बदनामी पुरे देश में हुई, असमाजिक तत्वों का बोल-बाला इसी समय अवधि में हुआ, शिझा के स्तर में गिरावट सबसे ज्यादा इसी समय काल में हुआ, बिहार कि सड़कों का बुरा हाल, ला एंड आडर के स्तर में गिरावट इसी समय अवधि में हुआ है। आज राष्ट्रिय जनता पार्टी के नेता चुनावी प्रचार में विकाश कि बाते करते है तो आप पिछले पंद्रह साल तक जब सत्ता में थे तो थोडा भी बिहार का विकाश क्यों नहीं किये ? अब आप पर कैसे यकीन किया जाय कि बिहार कि सत्ता अगर आपके हाथ में आएगी तो आप बिहार का विकाश करेंगे ? हम अपना बहुमूल्य वोट आपको क्यों दे ?
श्री राम विलाश पासवान ...... ये केवल बिहार से चुनाव जीतते है, बिहार के लिए नहीं जीते है, अगर बिहार के लिए जीते तो शायद MP का चुनाव जरुर जीतते। श्री पासवान ने अभी तक निरीह और गरीब जनता के वोट से केंद्र में केवल सत्ता के सुख का उपभोग किया है। अब सत्ता से हटने बाद इनको जनता याद आने लगी है। इन्हों ने परिवार वाद को सबसे ज्यादा बढ़ावा दिया है। ये अपने चुनाव प्रचार में ५०,०००/- पच्चास हजार रुपया गरीबो को देने कि बात कहते है जिसका कोई सूद नहीं लगेगा , क्या वाणिज्य बैंक ऐसा करेगी ? क्या केंद्र सरकार या राज्य सरकार का ऐसा कोई सर्कुलर है जो बिना सूद लिए ही या बिना गिरवी रखे बैंक पैसा बाँट दे साथ ही आधा डिसमिल जमीन गरीबो को देने कि बात करते है समझ में नहीं आती है कि ये आधा डिसमिल जमीन काहा से देंगे। शायद यह गुमराह करने वाला भाषण है । हम अपना वोट इनको क्यों दे, जो कि केवल अपने लिए जीते है ?
नितीश कुमार वर्तमान में बिहार के मुख्य-मंत्री....... पिछले पांच साल से बिहार के मुख्य-मंत्री है तथा पिछले पांच सालो में अपने सरकार द्वारा किये हुए कार्यो का मजदूरी बिहार कि जनता से मांग रहे है ताकि अगले पांच साल के लिए फिर इनकी सरकार बन सके।
नितीश कुमार जब पांच साल पहले बिहार के मुख्य-मंत्री बने तो उस समय बिहार बदहाली के आलम से गुजर रहा था, ला एंड ऑडर नाम कि कोई चीज ही नहीं थी, शिच्छा के स्तर में बहुत ज्यादा गिरावट आ गया था, बिहार के सडको कि हालत खस्ता-हाल थी उद्योग धंधे बंद पड़े हुए थे बहुत हद तक बड़े व्यापारी-वर्ग, बड़े किसान एवं मजदूरों का पलायन बिहार से हो चूका था। असमाजिक तत्वों का बोल-बाला था , वैसे समय में नितीश कुमार मुख्य-मंत्री बने और इस बदहाल बिहार को फिर से सँवारने कि चुनौती को स्वीकार किया। इन पांच सालों में आज बिहार कि सड़के अच्छी हालत में है, अब गाँव के कोई बीमार व्यक्ति को शहर के हस्पताल में आने के लिए कंधो कि जरुरत नहीं पड़ती है क्यों कि सड़के होने से अब गाँव में ही गाड़ियाँ मिल जाती है, अब किसान अपने अनाज को शहरो में लाकर ऊँचे दामो में बेच रहे है क्यों कि अब किसानो को बिचौलिए कि जरुरत नहीं है। यातायात का साधन बढ़ा है, जो रास्ते पहले चार घंटे में पुरे होते थे अब सड़कें होने से एक घंटे में पुरे हो जाते है। ला एंड ऑडर बहुत हद तक दुरुस्त है पिछले पांच सालों में करीब ४९ हजार अपराधियों को न्यायलय द्वारा शज़ा सुनाई गई हैअब कही जाने पर डर नहीं लगता है। अब देर रात तक सडको पर लोग नज़र आते है। स्कूलों में लड़के एवं लड़कियों कि संख्या में इजाफा हुआ है अब गाँव के स्कूलों में भी बच्चे नज़र आने लगे है, यह सायकिल और स्कूल यूनिफार्म का नतीजा है जो नितीश कुमार ने चलाई थी अब उसके परिणाम नज़र आने लगे है। अब सरकारी हस्पतालों में डाक्टर भी बैठते है मरीज भी नज़र आते है तथा दवाईयाँ भी मिलती है। कुछ नए कालेज खुले है कुछ खुलने के कगार पर है। बहुत हद तक जो बिहार का नाम धूमिल हुआ था अब धीरे-धीरे साफ़ होने लगा है तथा दुसरे राज्यों में बिहारी कहने में अब शर्म नहीं आती है। हाँ इन पांच सालों में बिहार कि तस्वीर बदली है। नितीश कुमार पहले बिहार के मुख्य-मंत्री है जो बिहार के हित के बारे में शोंचे है इसके पहले कोई मुख्य-मंत्री बिहार के हित के बारे में नहीं सोंचा है।
अब हम खुद आकलन कर ले कि हम किसे वोट दे ? फिर से बदहाल बिहार बनाना है तो उसके लिए कांग्रेस पार्टी है राष्ट्रिय जनता दल है तथा लो.ज.पा है। अगर खुशहाल बिहार बनाना है तो भारतीय जनता पार्टी तथा जनता दल यू है।

Friday, August 27, 2010

टूटते दरख़्त

संयुक्त परिवार अब बीते ज़माने कि बात लगने लगी है। आज का पढ़ा-लिखा इंसान संकीर्ण विचार का हो गया है। उसकी सोंच इतनी छोटी हो गई है कि, उसने जीने का दायरा भी छोटा कर लिया है। अब परिवार का मतलब होता है पति-पत्नी और उनके द्वारा उत्पन्न बच्चे। ऐसे छोटे परिवार बड़े शहरों में बहुत तायदाद में मिलेंगे, क्यों कि बड़े शहरों में पढ़े-लिखे लोगों कि संख्या ज्यादा है। पढने के बाद लोगों के विचार बड़े होते है सोंच बड़ी होती है उनके दायरे बड़े होते है लेकिन परिवार के नाम पर उनकी सोंच छोटी हो जाती है। उनके दायरे सिमट कर इतनी छोटी हो जाती है कि पत्नी और बच्चे तक ही सिमित रह जाती है। अब बड़े शहरों में संयुक्त परिवार के बराबर ही देखने को मिलेगा, लेकिन अभी भी गाँव और कश्बो में संयुक्त परिवार ही ज्यादातर मिलेगा, क्यों कि गाँव और कश्बो में पढ़े-लिखे लोगों कि संख्या कम है। उनका जीने का दायरा बहुत बड़ा है, उनके विचार बहुत बड़े है वो दिल से बहुत ही अमीर है। वो एक बड़े परिवार के लिए लिए जीते है उस परिवार में दादा-दादी, माता-पिता, भैया-भाभी, भाई-बहन, फुआ, छोटे भाई कि पत्नी और छोटे-छोटे हम सभी के बच्चे। सभी का आपस में प्यार, मिल-जुल कर रहना, जहाँ परिवार के एक सदस्य कि ख़ुशी पुरे परिवार कि ख़ुशी होती है तथा कोई एक सदस्य कि परेशानी पुरे परिवार कि परेशानी होती है। घर में जो सबसे बड़े होते वही घर के मुखिया होते है उनकी बात सभी को मान्य होती है। परिवार के बच्चों के अभिभावक केवल माता-पिता ही नहीं होते है दादा-दादी और भाई-बहन भी होते है अब ऐसा मिला जुला प्यार भरा परिवार टुकडो-टुकडो में टूटने लगा है क्यों कि अब सभी घरों में सरस्वती वास (निवास) करने लगी है।
मै आज से पच्चीस साल पहले एक संयुक्त परिवार का सदस्य था परिवार के सभी सदस्य पढाई पूरी करने के बाद नौकरी में गए तथा शादी होने के बाद एक-एक कर सभी लोगों ने अपने परिवार के साथ उस घर से विदा ले ली जहा उनका बचपन और जवानी का कुछ लम्हा बिता था, क्यों कि मेरे संयुक्त परिवार में सरस्वती का वास हो गया था। आज हमारे परिवार के लोग भिन्न-भिन्न शहरों में अपनी जिंदगी जी रहे है। शायद तन्हा और अकेला ?
संयुक्त परिवार के टूटने से लोगों में संकीर्णता कुछ ज्यादा ही गई है, अन्दर से अकेलेपन का डर बना रहता है दूर-दूर तक अपना कोई नज़र नहीं आता है, बच्चे जब अपनी पढ़ाई पूरी करके अपने कामो में व्यस्त हो जाते है तो यह अकेलापन और खलने लगता है। यह तब तक अच्छा लगता है जब तक मै अपने कामो में व्यस्त हूँ लेकिन बुढ़ापा बहुत ही दुखदाई हो जाता है। शायद यह संयुक्त परिवार के टूटने का ही नतीजा है।