Monday, June 14, 2010

वोट कि राजनीत

देश को आज़ादी मिले आज ६२ साल हो गया लेकिन मुस्लिम समुदाई आज भी अल्प-संख्यक ही है अगर धर्म के नाम पर ही जनसँख्या कि गड़ना करनी है तो भारत में हिन्दू सबसे ज्यादा है उनकी संख्या - ८२७५७८८६८ जो पूरी जनसँख्या का ८०.५% होता है जनसँख्या में मुस्लिम समुदाई भारत में दुसरे स्थान पर , उसकी जनसँख्या - १३८१८८२४० है जो 1३.४% है, इशाई धर्म कि जनसँख्या - २४०८००१६ जो २.३% है , सिख धर्म कि जनसँख्या - १९२१५७३० जो १.९% है , बौध धर्म कि जनसँख्या - ७९५५२०७ जो ०.८% है , ये गड़ना २००१ कि है उसके बाद कोई गड़ना नहीं हुई है। अब जो गड़ना होने वाली है वह जाती के आधार पर होगी तब कुछ अलग परिणाम सामने आएंगे।
आज़ादी के बाद से आज तक सभी राजनितिक पार्टियाँ मुस्लिम समुदाई को अल्प-संख्यक मानती आ रही है अगर ये अल्प-संख्यक है तो क्या केंद्र में या फिर राज्य में जिस भी पार्टी कि सरकार हो क्या वो मुसलमानों को बहुसंख्यक बनाने के लिए कोई संवैधानिक नियम बनायें है या उनको कोई अतिरिक्त अधिकार दिए गए हैं जिससे कि अपनी संख्या को बढा सकें, शायद नहीं ...तो फिर ये राजनितिक पार्टियाँ मुसलमानों को इसलिए अल्प-संख्यक कहती है ताकि उनका वोट उन्हें मिल सके। आंखिर इन्हें कबतक छला जायेगा, मुसलमान इसी देश के है वो किसी दुसरे मुल्क से नहीं आयें है। तो फिर यह दोहरी निति क्यों अपनाई जाती है। केवल वोट कि राजनीति करने से अल्प-संख्यकों का उद्धार नहीं हो सकता है इसके लिए सरकार को पहल करनी पड़ेगी मुसलमानों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए। जिस देश में एक धर्म को मानने वाले लोग ८०% से ज्यादा है वहां पर दुसरे धर्म के लोग चाह कर भी उस प्रतिशत कि बराबरी नहीं कर सकते हैं , क्यों कि प्रकृति के विपरित कोई जा ही नहीं सकता है। तो फिर ये खेल खेलना बंद करे राजनितिक पार्टियाँ , और मुस्लिम समुदाय को बार-बार अल्प-संख्यक कहकर अपमानित नहीं करे।

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