Monday, August 2, 2010

महंगाई डायन

लूट..लूट..लूट॥ जंहा देखो वही मची है लूट । आज महंगाई बे-लगाम हो गई है, बाज़ार में मंडी में जहाँ देखो महंगाई चरम सीमा पर पहुँच गई है। इस महंगाई से कोई भी वस्तु अछुती नहीं है। अब सौ रुपये का नोट दस रुपये का लगने लगा है। इन बे-तहासा बढ रही महंगाई पर अंकुश लगने वाला कौन है ? सरकार नाम कि वस्तु इस देश में नहीं। सरकार रहती तो जरूर इस महंगाई पर ध्यान देती, अगर जनता द्वारा चुनी हुई सरकार है तो फिर क्यों नहीं ध्यान दे रही है ? इस आग में तो निरीह जनता ही जल रही है। सरकारें पांच साल के लिए बनती है, किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण जोड़-तोड़ कि राजनिती कर किसी भी तरह पार्टियाँ सत्ता पर काबिज़ तो हो जाती है और उन पांच सालों को सत्ता बाचने में गुज़ार देती है, मतलब यह कि इनको जोड़-तोड़ से फुर्सत मिलेगी तब ना ये जनता के बारे सोचेंगे ?
बचपन में मैंने एक बार सर्कस देखी थी उसका आकर्षण मेरे मन-मस्तिष्क में ऐसी पैठ बनाई कि मै दिन के समय में भी सर्कस के तम्बू के आस-पास घूमते रहता था , उसी दरम्यान मेरे जेहन में एक बात घर कर गई ... इन सर्कस वालों कि अपनी दुनियां ही अलग है। ये आपस में ही एक दुसरे से शादी कर लेते है और सर्कस में ही जिंदगी गुज़ार देते है जब इनका बच्चा होता है तो वह भी सर्कस कि बारीकियों को सिख कर उसी सर्कस में काम करने लगता है और इनकी जिंदगी इसी तरह चलती है। वैसे ही फिल्मी दुनियां वालों कि भी जिंदगी अलग है वो चकाचौध से भरी जिंदगी जीने के आदि है इसलिए वो उस दुनियां से बाहर नहीं निकल पाते है और उसी में अपनी पूरी जिंदगी गुज़ार देते है, इनकी भावी पीढियां भी इसी में अपनी जिन्दगी तलाशती है। आर्मी में नौकरी किये लोग आम जिन्दगी में घुल-मिल नहीं पाते है क्यों कि वो एक अनुशासित जिन्दगी जीने के आदि हो चुके लोग है जहा अनुशासन नहीं है वहां अपने को मिक्स नहीं कर पाते है, इसलिए अनुशासित लोंगो के बीच अपनी दुनियां बसा लेते है।
ठीक इसी प्रकार हमारे देश के राजनेताओं कि भी एक अलग दुनियां है। ये सत्ता का खेल खेलने में माहिर लोग है, झुढ़, फरेब और मक्कारी से भरी जिन्दगी, आम लोगों को बेवकूफ बनाने कि कला में अव्वल ये राज नेता गरीबों का मसीहा बन गरीबों को ही लूट लेते है। १२० करोड़ जनता कि कमाई पर राज करने वाले इन राजनेतावों को महंगाई नज़र ही नहीं आ रही है ? क्या ये सावन के अंधे है जो इन्हें हर तरफ हरियाली ही हरियाली नज़र आ रही है ? हकीकत तो यह है कि इन लोगों का पेट भरा हुआ है इन्हें कैसे महंगाई नज़र आएगी। संवैधानिक तौर पर इनको हर चीज जो मुफ्त में मिली हुई है जैसे-भोजन, आवास, हवाई-यात्रा, रेल-यात्रा, बिजली, पानी, पेट्रोल, डीजल, चार चक्के कि गाड़ी और तो और ऊपर से तनख्वाह, अब ये बताइए कि ये जनता के लिए क्या सोचेंगे ? बस ये यही सोचते है कि अगले चुनाव में कौन सा सब्ज-बाग़ जनता को दिखाऊ ताकि मै फिर चुनाव जीत सकूँ और मुफ्त कि मलाई खाने को मिल सके, फिर महंगाई बढे या टैक्स इससे क्या अंतर पड़ता है। क्यों कि भारतीय जनता कि यादाश्त बहुत कमजोर है वह हर बात बहुत जल्दी भूल जाती है और इसी का फायदा हमारे राजनेता उठाते है।

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