Friday, December 3, 2010

हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा

वह बचपन में ही माँ के प्यार से बंचित हो गया था पिता ने दूसरी शादी कर ली थी उसकी उम्र यही कोई सात आठ साल कि रही होगी। उसका बचपन नितांत अकेला था सालो वह अपनी माँ कि यादो में गुमसुम होकर घर के किसी कोने में घंटो आंसू बहाया करता था क्यों कि उसको अपनी माँ से बहुत लगाव था। उसकी माँ क्या गई उसका बचपन ही चला गया। उसकी देख भाल करने वाला भी कोई नहीं था, वह था तो संयुक्त परिवार का ही हिस्सा लेकिन परिवार में भी उसके प्रति किसी कि सोंच सकारात्मक नहीं थी उसका बचपन इन बातों को हमेसा महसुश करता था इसीलिए वह अपने घर में बहुत कम समय गुजार पाता था और अपने बचपन के दोस्तों के साथ ज्यादा समय गुजारता था। जैसे तैसे करके उसने सरकारी स्कूल से मैट्रिक तक कि पढाई कि, मैट्रिक में उसने प्रथम श्रेणी में परीच्छा पास किया जिसके कारण बारह सौ रूपये का उसको स्कालरशिप मिला उस स्कालरशिप के पैसे से ही उसने बीए तक कि पढाई की। पढाई ख़त्म होने के बाद अपने दोस्तों के साथ अपना समय बर्बाद करता था वह समझ नहीं पाता था कि आगे क्या करेगा क्यों कि उसे सही रास्ता बताने वाला भी कोई नहीं था पढाई ख़त्म होने के बाद जब बेकार समय बर्बाद होता है तो लोग उसे आवारा या बदचलन कहते है शायद उसके साथ भी यह बात लागु होती थी जब उसे कोई रास्ता नज़र नहीं आया और हर तरफ से निराष हो गया तो दुसरे शहर में सरकारी नौकरी कर रहे अपने छोटे चाचा से कोई काम धंधा करने के लिए कहा उसके चाचा ने कहा ठीक है तुम मेरे साथ चलो देखता हूँ तुम्हारे लिए कौन सा काम ठीक रहेगा और वो अपने साथ लेकर दुसरे शहर को चले गए क्यों कि वो सरकारी नौकरी में एक अच्छे ओहदे पर थे इसलिए ठीकेदारी करने के लिए उससे कहे और वह ठीकेदारी का काम करने लगा उसके स्वभाव से वह काम मेल नहीं खाता था फिर भी वह काम करता था क्यों कि बेकार से बेगार भला होता है कुछ सालों बाद वह पटना गया और अपने चाचा के घर पर ही रहने लगा चाचा ने शायद उसकी बेबसी को समझे और उससे एक दुकान करने के लिए कहे उसने एक गेनरल स्टोर कि दुकान खोला कुछ सालों बाद उसके चाचा ने एक अच्छी सी लड़की देख उसकी शादी कर दी शादी के बाद कुछ माह तक उसको अपने साथ रखे फिर एक दिन उससे कहे , अब तुम्हारा परिवार हो गया है तुम अपनी जिंदगी अपने तरीके से जियो, इसलिए तुम अपने लिए किराये का मकान लेलो उसने भी अपने चाचा के कहे बातो पर अमल किया और अपने रहने के लिए किराये का मकान ले लिया
समय बीतता गया चार साल में उसके यहाँ दो बच्चो ने जन्म लिया इधर खर्च बढ़ने से उसके व्यापर में नुकसान होता गया नुकसान इतना हुआ कि उसका व्यापर ही बंद हो गया अब उसके पास किराये का मकान था अदद पत्नी और दो छोटे बच्चे हर चीज खरीद कर खाना, आय का कोई जरिया नहीं, आस-पास कोई मददगार भी नहीं, दुकान के वक्त से ही व्यपारियों का चला रहा कुछ बकाया सब मिलाकर हालत बहुत ही दयनीय, फिर भी वह टुटा नहीं बल्कि अन्दर ही अन्दर चट्टान कि तरह अपने इरादों को मजबूत करता गया क्यों कि उसने कुछ सपने पाल रखे थे अपने लिए अपने बच्चो के लिए शायद वह सपने ही उसके हौसले को बुलंद बनाते थे और जीने कि प्रेणना देते थे या ये कहे कि अभाव में गुज़रा उसका बचपन अपने बच्चो को अभाव में परवरिश करना नहीं चाहता था इसलिए बिना पूंजी का उसने व्यापार शुरू किया किराये पर मकान दिलाने का (To-Let Service) जी तोड़ उसने मेहनत करना शुरू किया शुरू में उसे बहुत परेशानिया आई लेकिन धीरे-धीरे सब ठीक होता गया अपनी परिस्थितियों से उसने कभी समझौता नहीं किया और निरंतर अपने काम में वह आगे बढ़ता गया कभी पीछे मुड कर नहीं देखा वह अपने काम के प्रति पूरी तरह लगनशील बना रहा उसके काम करने कि लगन ही निरंतर आगे बढाती गई उसने सरकारी स्कूल में अपनी पढाई कि लेकिन अपने बच्चो को वह प्राइवेट इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढाया उच्च शिच्छा के लिए उसने भारत के दुसरे राज्यों में अपने बच्चो को पढने के लिए भेजा उसके बच्चे पढाई में अच्छे कर रहे है या ये कहे कि अपने पिता के संघर्ष के दिनों को याद रखे है इसलिए एक सुनहरे भविष्य का तानाबाना बुन कर आगे कि तरफ अग्रसर है
यह कहानी उस दिशाहीन युवक कि है जो घोर अभाव में जीवन यापन करने के बाद भी सुनहरे भविष्य का तानाबाना बुना था उसने भविष्य के सपने पाल रखा था और उसके वही सपने जीवन के विकट परिस्थितियों से उसे बहार निकल लेते थे संघर्ष कि पथरीली राहों पर निरंतर आगे बढ़ने कि प्रेणना देते थे उसके सपने उसे कभी टूटने नहीं दिए बल्कि उसके इरादों को और मजबूत बनाते गए, बार-बार निराशा हाथ लगने के बाद भी वह दुगने जोश से अपने कामो में लग जाता था, क्यों कि उसके सपने हमेशा उसे क्रियाशिल बनाये हुए थे और वह अपने सपनो को आकर देने में लगा था
उसके सपने अभी पूरी तरह आकर नहीं ले पाए है और वह आज भी क्रियाशिल है अपने सपनो को आकर देने के लिए वह आज भी चट्टान कि तरह डटा है अपने सपनो को साकार करने के लिए
प्रेणना :- भावी युवा पीढ़ी अपने भविष्य के सपने पाले तो वह जीवन में क्रियाशिल बने रहेगे और अपने सपनो को मूर्तरूप दे पायेगे, क्यों कि सपने जीवन में निरंतर आगे बढ़ने कि प्रेणना देते है

3 comments:

  1. भाई सुख दुःख तो लगा ही रहता है /
    कितने कवियों ने दुःख सुख पर कविता बनाई
    लिखते रहे /सुंदर /मैं भी पटना से हूँ /
    कभी मेरे ब्लॉग पर भी आये //
    http://babanpandey.blogspot.com

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  2. is post ke maadhyam se aapne
    bahut sundar sandesh diya hai

    aabhaar
    shubh kamnayen

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  3. प्रेरक रचना के लिए बधाई स्वीकार कीजिए। इस रचना में कहीं-कहीं मैं अपना अतीत खोज रहा था। कल नेताजी सुभाषचंद बोस की जयन्ती थी उन्हें याद कर युवा शक्ति को प्रणाम करता हूँ। आज हम चरित्र-संकट के दौर से गुजर रहे हैं। कोई ऐसा जीवन्त नायक युवा-पीढ़ी के सामने नहीं है जिसके चरित्र का वे अनुकरण कर सकें?
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    मुन्नियाँ देश की लक्ष्मीबाई बने,
    डांस करके नशीला न बदनाम हों।
    मुन्ना भाई करें ’बोस’ का अनुगमन-
    देश-हित में प्रभावी ये पैगाम हों॥
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    सद्भावी - डॉ० डंडा लखनवी

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