Monday, November 14, 2011

क्या यही लोकतंत्र है ?

भारत एक लोकतान्त्रिक देश है और लोकतंत्र में जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि बहुमत के हिसाब से ही केंद्र या राज्य में अपनी सरकार बनाते है। सरकार का कार्य होता है वह राज्य या देश कि जनता के हितो का ध्यान रखे जैसे स्वतन्त्रता कि आज़ादी, अराजकता और मुनाफाखोरी देश में ना फैले, जनता कि जान और माल कि रक्षा, देश कि सीमाएं पूरी तरह चाक चौकस बंद हो ताकि बाहरी आक्रमण देश पर हो सके। अगर सरकार इन सभी कार्यो का निर्वाह पूरी ईमानदारी से करती है तो वह एक लोकतान्त्रिक सरकार है और वह अपने जनता के विश्वासों पर खरा उतरती है।
लेकिन वर्तमान में केंद्र कि सरकार क्या इन सभी बातों पर ध्यान दे रही है ? शायद नहीं, अगर ध्यान देती तो आज देश में जीस हिसाब से महंगाई बढ रही है क्या वह अराजकता और मुनाफाखोरी नहीं है ? क्या उद्योगपतियों के हितो का ध्यान रखना और आम जनता के हितो का ध्यान रखना, क्या यह जनतंत्र है ? पेट्रोल के दामो में बेतहासा बढ़ोतरी कर सरकार जनता को क्या बताना चाहती है। पेट्रोल कम्पनियां जरा सा नुकसान में जाती है तो वह केंद्र सरकार पर दाम बढ़ाने का दबाव बनाने लगती है और केंद्र सरकार उनके दबाव में आकर दाम बढ़ाने कि अनुमति दे देती है क्या यह एक जनतांत्रिक सरकार है ? अगर जनतांत्रिक सरकार होती तो कंपनियों को यह हिदायत करती कि पेट्रोल का दाम नहीं बढेगा बल्कि कम्पनियाँ अपने खर्चे में कमियां लाये, लेकिन केंद्र कि वर्तमान सरकार जनता के हितो का ध्यान रख उद्योगपतियों का ध्यान रखी जिसका नतीजा हुआ कि पेट्रोल के दामो में बार-बार इजाफा होता गया और महंगाई भी उसी अनुपात में बढती गई। लेकिन सरकार को इससे कोई मतलब नहीं, महंगाई बढती है तो बढे। केंद्र कि सरकार ने प्रतिदिन ३२/- रुपया कमाने वाले को अमीर मानती है यानि गरीबी रेखा से ऊपर है वह आदमी लेकिन उस आदमी कि औकात इतनी भी नहीं है कि वह एक लीटर पेट्रोल खरीद सके ? इस देश का दुर्भाग्य ही है कि ३२/- रुपया कमाने वाला व्यक्ति अमीर तो है लेकिन एक लीटर पेट्रोल खरीदने कि उसकी हैसियत नहीं है। क्या यह सरकार कि गलत नीतियों का परिणाम नहीं है।
हमारे देश के प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह एक कुशल राजनेता के साथ-साथ एक अच्छे विद्वान्, अर्थशास्त्री और विचारक भी है। एक मजे हुए अर्थशास्त्री के रूप में उनकी ज्यादा पहचान है। अपने कुशल और ईमानदार छवि कि वज़ह से सभी राजनैतिक दलों में उनकी अच्छी साख है। लेकिन एक कुशल समाजसेवी नहीं है। वह देश कि अर्थव्यवस्था को ऊँचाइयों पर ले जा तो सकते है जिसका फायदा उद्योगपतियों और कुछ खास मुट्ठी भर लोगो को होगा। क्यों कि वह अर्थशास्त्री है और हर चीज में मुनाफा देखते है क्या देश में बढ़ रही गरीबी और महंगाई में भी मुनाफा ही देख रहे है ? देश कि जनता आज परेशान हाल है सौ रुपये में हम एक झोला सब्जी भी खरीद कर नहीं ला सकते और सरकार कहती है कि बत्तीस रुपया कमाने वाला व्यक्ति अमीर है। जनता के पैसो पर राज करने वाले सत्ता पर आसीन राजनेतावों जनता कि आवाज़ को पहचानो उसकी नब्ज को टटोलो जनता से तुम हो तुमसे जनता नहीं है उसके पैसे को लूटना बंद करो, महंगाई पर अंकुश लगाओ, देश में बढ़ रही मुनाफाखोरी और अराजकता पर रोक लगाओ, उद्योगपतियों पर भी अंकुश लगाओ वह उत्त्पादन पर ज्यादा मुनाफाखोरी ना करे। कही ऐसा ना हो कि जनता ही तुमको लूट ले क्यों कि भारतीय जनता कि सहनशीलता कि एक सीमा है कही ऐसा ना हो कि अपना खज़ाना भरने के चक्कर में तुम उस सीमा को पार कर जाओ जहाँ भारतीय जनता अपनी सहनशीलता खो दे। फिर क्या हस्र होगा, इतिहास इसका गवाह है।
हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री जिनकी ईमानदारी कि कसमे खाई जा सकती है क्यों कि सभी राजनैतिक पार्टियों के लोग इनको ईमानदार ही कहते है। इन्ही के मंत्रिमंडल में आसीन भूतपूर्व संचार मंत्री .राजा ने 2G स्पेक्ट्रम घोटाल इतना बड़ा किया जो अभीतक के घोटालो में सरताज है। यह घोटल एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ का है जो देश कि आज़ादी के बाद से अभीतक के घोटालो में सबसे बड़ा घोटाला है। अभी श्री .राजा तिहाड़ जेल कि शोभा बढ़ा रहे है।
हमारे देश के भूतपूर्व खेल मंत्री श्री सुरेश कलमाड़ी जी कामनवेल्थ खेल में घोटालो का ऐसा खेल खेला जो सत्तर हजार करोड़ का था अब ये तिहाड़ जेल में कोई और खेल खेलने के मनसूबे तैयार कर रहे है।
महारास्ट्र के भूतपूर्व मुख्यमंत्री श्री अशोक चौव्हान ने तो वो कारनामे किये जो बे मिसाल है वो कारगिल के शहीदों के लिए बने आवास में ही उलट-फेर कर दिए। यानि कि मुर्दे के शारीर से ही कफ़न छीन लिए। अब ऐसे राजनेताओं से क्या उम्मीद कर सकते है और मनमोहन सिंह को कैसे ईमानदार कहा जा सकता है क्यों कि ये सभी घोटाले उनके नाक के नीचे हुई है।
ये राजनेता किस मिट्टी या धातु के बने है जो कितना भी खा ले है फिर भी पेट नहीं भरता है। इनकी तुलना अगर भिखारियों से कि जाय तो ज्यादा तार्किक लगता है, क्यों कि भिखारियों को आप कितना भी खिला दो लेकिन उनका पेट नहीं भरता, वही हाल हमारे राजनेताओं का है, और ऐसे ही नेता इस देश कि बाग़ डोर सम्हाले बैठे है।
अब हमारे देश कि सीमाएं कितनी चाक चौकस बंद है यह भी देख लीजिये १३ दिसम्बर २००१ को कुछ बन्दुकधारी आतंकवादी हमारे लोकतंत्र कि मंदिर संसद पर हमला कर देते है, गनीमत है कि हमारे सभी सांसद और मंत्री सही सलामत बच जाते है, हाँ कुछ पुलिसकर्मी जख्मी होते है और कुछ कि जान जाती है। इस घटना को अंजाम देने वाला मुज़रिम मिलने के बाद भी अभीतक सरकारी मेहमान बना जेल में रोटियां तोड़ रहा है।
अब भारत कि आर्थिक राजधानी मुंबई पर २६ नवम्बर २००८ को समुन्द्र के रास्ते आतंकवादी आते है और मुंबई महानगरी में AK-47 से निरीह और निहत्थे नागरिको पर गोलियों कि बौछार कर देते है। इस हमले में बहुत से निर्दोष मारे जाते है। क्या हमारी देश कि सीमाएं पूरी तरह चाक चौकस बंद है ? शायद नहीं। ऐसी आतंकवादी घटनाएँ हर साल इस देश में घटती है चाहे वो बम ब्लास्ट हो सीरियल ब्लास्ट हो या गोलियों कि बौछार हो मारे तो निरीह प्राणी ही जाते है और हमारा देश वैसे आतंकवादियों को पकड़ने के बाद भी सरकारी मेहमान बना कर जेलों में बंद रखती है और उसके हिफाज़त के लिए जनता का करोडो रुपया उस पर खर्च करती है क्या ऐसे आतंकवादियों को जो सरेआम कत्लेआम किये है क्या इनको भी सरेआम फांसी नहीं दे दी जानी चाहिए ? इनसे सहानभूति कैसी ?
अगर आप इन राजनेताओं से अच्छे कि उम्मीद करते है तो यह आपकी भूल है, यह देश इन मुट्ठी भर राजनेताओं का नहीं है बल्कि यह देश आपका अपना है इसे अच्छा या बुरा बनाना आपके हाथो में है। प्रजातंत्र में जनता अगर खुशहाल है तो देश चहुओर तरक्की करता है अगर जनता दुखी है तो देश पिछड़ता है

Wednesday, November 2, 2011

अन्ना टीम को बदनाम कर केंद्र में बैठी सरकार देश से क्या कहना चाह रही है .

अन्ना टीम के सदस्यों को बदनाम करने कि चाल चल कर केंद्र में आसीन कांग्रेस कि सरकार (कांग्रेस कि सरकार कहना इसलिए उपयुक्त है क्यों कि यूपीए कि सरकार में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है तथा सभी मुख्य विभाग अगर कुछ को छोड़ दिया जाय तो कांग्रेस के पास ही है।) आखिर भारतीय जनता को क्या बताना चाहती है ? क्या वह यह बताना चाहती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ वही व्यक्ति आवाज़ उठा सकता है जिसके पुरे जीवन में कभी किसी प्रकार का झूठा या सही कभी कोई आरोप न लगे हों ? ऐसा व्यक्ति तो शायद मिलना मुश्किल ही होगा, क्यों कि वह इंसान ही होगा, भगवान तो आयेगें नहीं, फिर वैसे इंसान को कहाँ तलाश किया जाय। भगवान भी जब इंसान के रूप में इस मृत्युलोक में जन्म लिए है तो उन पर भी आरोप लगे है चाहे त्रेतायुग में रामचंद्र रहे हो या द्वापरयुग में जन्मे श्री कृष्ण। हम सभी तो कलयुग में जी रहे है जिसमे कल, बल और छल ही प्रमुख है अब ऐसे कलयुग में हम कहाँ से वैसे इंसान को लाये जो ऊपर से नीचे तक साफ़, सुथरा और स्वच्छ छवि का हो जो भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठा सके और केंद्र में बैठी कांग्रेस कि सरकार उसका इतिहास, भूगोल खघालने के बाद भी कोई नुक्ताचीनी न निकाल सके ? ऐसा इंसान कहाँ से लाया जाय ? क्यों कि इस भौतिक युग में कांग्रेस जिस इंसान कि उम्मीद कर रही है वैसा इंसान तो मिलना संभव नहीं है और अगर वैसा इंसान नहीं मिलेगा तो फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने का हक भी नहीं बनता है, क्यों कि कांग्रेस तो बार-बार यही कह रही है चाहे वो कांग्रेस के शिखंडी दिग्विजय सिंह से कहवाये या कोई और प्रवक्ता से। दिग्विजय सिंह एक वरिष्ट कांग्रेसी नेता है उनके बयानों को सुनकर लगता नहीं कि जो शब्द वो बोल रहे है वो शब्द उनके अपने हो, आखिर कबतक ऐसे बयनो को बोल-बोल कर अपनी खिल्ली उडवाते रहेगें ? अब तो लोग उनके बयानों को सुनना भी पसंद नहीं करते है।
आज अन्ना हजारे जनता कि आवाज़ बन गए है क्या कांग्रेस या उसकी सहयोगी पार्टियाँ इन बातो को नहीं समझती है या राजनीती कि कोई और खेल खेली जा रही है। जनता सरकार से क्या मांग कर रही है, यही न कि लोकपाल कानून बनाया जाय, क्यों कि भारतीय जनता भ्रष्टाचार और महंगाई से त्रस्त हो चुकी है इसलिए इसपर अंकुश लगाने के लिए कानून बनाया जाय, वह अपनी चुनी हुई सरकार से लोकपाल कानून बनाने कि मांग कर रही है और सरकार है कि जनता कि बात ही नहीं समझ रही है। केंद्र कि सरकार क्या वह भारतीय जनता कि सहनशीलता देखना चाहती है या वह यह समझ रही है कि अन्ना टीम को तोड़ दो फिर कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाएगा। शायद सरकार यह गलत सोंच रही है। कांग्रेस के ही प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गाँधी ने भी एक बार जनता कि आवाज़ दबाने के लिए पुरे देश में इमरजेंसी लगा दी थी और विपच्छ के जितने भी नेता थे सभी को जेल में डाल दिया गया था जिसका हस्र यह हुआ कि कांग्रेस को पुरे भारत से अपनी सत्ता से हाथ धोना पड़ा था। समय रहते केंद्र कि सरकार को यह समझना चाहिए कि यह लड़ाई अन्ना बनाम कांग्रेस नहीं है बल्कि जनता बनाम कांग्रेस है।


Monday, September 19, 2011

लूट मची है लूट मची, जहाँ भी देखो मची है लूट

लूट मची है लूट मची, जहाँ भी देखो मची है लूट
मंत्री , सांसद या नेता हो चाहे कोई अभिनेता हो
उद्योगपति हो या व्यापारी चाहे कोई हो अधकारी
लूट रहे है ऐसे मिलकर जैसे है नहीं इनका देश
भिखारी तुम बनकर ऐसे लूट रहे हो अपना देश
देश तुम्हारा अपना ही है जिससे है तेरी पहचान
सभी लूटे है तेरे देश को तुम तो लूटना बंद करो
नहीं कोई चंगेज के वंशज नाही तूम अंग्रेज हो
वही लुटेरे लुटेरे थे जो लूट लिए थे तेरे देश को
इच्छाओं पर रोक लगाओ नहीं तो बढ़ता जायेगा
इसकी पूर्ति कभी होगी क्या कोई कर पाया है
क्या तुम पूरा कर पाओगे, जो तेरी अभिलाषा है
नहीं करोगे मरोगे ऐसे त्यागो अब तुम लालच को
देश तुम्हारा अपना ही है इसको अब समृद्ध करो

Thursday, September 15, 2011

महंगाई क़ी एक और मार

डरे हुए हम लोग सभी है मनमानी कर रही सरकार।
बढ़ा
बढ़ा कर महंगाई को जीना कर दिया है दुश्वार
ऐसा
जीना क्या जीना जहाँ मर मर के हर रोज जिए
जिन्दा हो तो निकलो तुम फिर छीनो अपना अधिकार

एक बार फिर तेल विपणन कंपनियों ने पेट्रोल कि कीमतों में ३.१४ रूपये का इजाफा कर मध्यवर्गीय लोगो कि परेशानियाँ बढ़ा दी है या ये कहे कि उनके मासिक बज़ट पर प्रहार किया है। हर बार तो अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दाम महंगे होने से पेट्रोल के दाम बढ़ते थे लेकिन इस बार पेट्रोल का दाम बढने का कारण दूसरा ही है। डालर के मुकाबले रूपये के कमज़ोर होने से कच्चे तेल का आयत महंगा पड़ने कि आड़ में पेट्रोल कि कीमतों में ३.१४ रुपए इजाफा किया गया है। पिछले वर्ष जून से अब तक पेट्रोल के दाम दस बार से ज्यादा बढ़ चुके है अगर बढ़ने कि रफ्तार यही रही तो इस साल के अंत तक पेट्रोल कि किमत १००/- रुपए प्रति लीटर तक पहुँच जायेगा। सरकार ने पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य पर से नियंत्रण मानो कंपनियों की मनमानी के लिए हटा लिया हो। जब मन में आया दाम बढ़ा दिया। कंपनियों के घाटे की चिंता तो सरकार को है। आम आदमी के दम निकलने की चिंता कौन करेगा ?
पेट्रोल की ज्यादा खपत मध्यम वर्ग में होता है। चाहे वो दोपहिया गाड़ी (मोटरसाईकिल, स्कूटर या स्कूटी) या तीन चक्के की गाड़ी ऑटो रिक्शा अगर वो चार चक्के की गाड़ी लेता है तो अधिकांश पेट्रोल माडल ही होता है।
क्या सरकार जनता की परेशानियाँ नहीं समझ रही है। पेट्रोल की कीमत बढने से महंगाई और बढ़ेगी, लोगों पर अतिरिक्त भोझ बढ़ता जायेगा। यह सरकार के हित में भी गलत ही होगा क्यों की जनता सरकार से दूरियां बढ़ाएगी। अगला चुनाव जीतना भी वर्तमान सरकार के लिए मुश्किल हो जायेगा। या कही सरकार यह तो नहीं सोंच रही है की पांच साल के लिए सत्ता जो हाथ में आई है इसमें जीतना लूटना हो लूट लो क्यों की अगला चुनाव तो हम जितने नहीं जा रहे है इसलिए महंगाई दर इतना ऊपर कर दो की अगले चुनाव के बाद जो सरकार चुन कर आएगी उसे मुसीबतों का सामना करना पड़े। फिर हमारे पास बहुत समय रहेगा नई सरकार को बदनाम करने के लिए और तबतक जनता हमारी गलतियों को भूल गई रहेगी। (यानि की पांच साल के अन्तराल के बाद सत्ता में आने का खेल शुरू होगा)
महंगाई का अगर आलम यही रहा तो लोग अन्दर ही अन्दर टूटते जायेगें (आक्रोशित होंगे) नतीजा यह होगा की लोग सडको पर फिर से उतरेगे और इस बार कोई अन्ना नहीं होंगे बल्कि जनता होगी सिर्फ आक्रोशित जनता जिसका नेत्रित्व जनता ही करेगी वैसे में हमारे मुट्ठी भर राजनेताओ का क्या होगा जो अपने को राजा समझ बैठे है।

लालच बुरी बला है बचपन में पढ़ा था मैंने

लालच बुरी बला है
बचपन
में पढ़ा था मैंने
लालच बुरी बला को
मै
छोड़ दिया था पहले
था आदर्श कुछ अपना भी
नहीं
इसे अपनाएंगे
रुखी सुखी खायेंगे
पर मस्तक नहीं झुकायेंगे
बचपन से जब हम जंवा हुए
अपने
पैरों पर खड़ा हुए
बचपन कि वो सब बाते
मै
भूल गया था अबतक
अब याद नहीं आदर्श कि बाते
याद
नहीं है बचपन
कंधो पर जब बोझ पड़ा तो
भूल गया आदर्श कि बाते
अब याद नहीं आदर्श कि बाते
चाह है आगे बढ़ने कि
जो मिल जाता वो छोटा है
जो नहीं मिला उसे पाना है
मै मृगतृष्णा में भटक गया
और लालच में फंसता ही गया
इस लालच का कोई अंत नहीं है
यह तो बढ़ता जाता है
इस लालच में है गँवा दिए
अपना जमीन अपना ज़मीर
अब गया वो बचपन गई जवानी
बुढ़ापे संग डोल रहा
पाया क्या है समझ न आता
जो खोया वह सोंच रहा
खो दिया मै जीवन अपना
हाथ लगा ना कोई सपना

Monday, September 5, 2011

...आवाज़...: अन्ना कि ललकार

...आवाज़...: अन्ना कि ललकार: अन्ना कि ललकार पर उमड़ा जन सैलाब है।
आगे-आगे बढ़ते जाओ मंजिल तेरे पास है।।
थकना नहीं न डरना है बस आगे ही बढना है।
आगे बढ़कर लेलो त...

Saturday, September 3, 2011

जन-आन्दोलन

अन्ना हजारे का आन्दोलन एक सवाल खड़ा करता है भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में इतने बृहत् पैमाने पर जन-आन्दोलन क्यों सफल होता है। एक तरफ जनता खड़ी तो दूसरी तरफ सरकार। भारत को आज़ादी मिले ६४ साल ही हुआ है लेकिन इन ६४ सालों में ऐसा जन-आन्दोलन दो बार हो चूका है। पहला जन-आन्दोलन १९७४ में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेत्रित्व में हुआ था उस समय भी केंद्र में कांग्रेस पार्टी ही सत्ता में थी और दूसरा जन-आन्दोलन २०११ में अन्ना हजारे के नेत्रित्व में हुआ और इत्तफाकन इस बार भी केंद्र में कांग्रेस पार्टी ही सत्ता में है।
ऐसे जन-आन्दोलन क्यों सफल होते है:-
[१] जनता द्वारा चुने हुए जन-प्रतिनिधि अपने कार्यो को जनता के हितो में नहीं करते है जिसके कारण जनता के अन्दर आक्रोश बढ़ने लगता है जिसके कारण ऐसे जन-आन्दोलन उभरते है।
[२] लोकतान्त्रिक व्यवस्था में अगर किसी एक पार्टी कि सरकार दो तीन चुनाव जीत कर लगातार सत्ता में रहती है तो वह अपनी मनमानी करने लगती है जिसका असर जनता पर पड़ता है। क्यों कि लगातार सत्ता में रहने वाली सरकार जनता के हितो का ख्याल नहीं रखती है यानि वह निरंकुस शासक कि तरह कार्य करने लगती है और वही पर जनता के अन्दर आक्रोश बढ़ने लगता है फिर वह आक्रोश जन-आन्दोलन का रूप ले लेता है।
पिछला चुनाव जीत कर जब कांग्रेस पार्टी केंद्र कि सत्ता में आई तो सबकुछ ठीक-ठाक था उसने कार्य भी अच्छा किये, भारत कि अर्थ-व्यवस्था को एक नई ऊंचाई दी, जनता को भी लगा कि सरकार देशहित में कार्य कर रही है इसलिए जनता दुसरे चुनाव में कांग्रेस के प्रति ज्यादा उत्सुकता दिखाई और इसके सांसदों कि संख्या पिछले चुनाव के वनिस्पत ज्यादा सांसद चुनाव जीत कर लोकसभा में आये। शायद जनता से यही चुक हुई जिसका फायदा कांग्रेस पार्टी ने उठाई।
दुसरे दौर में कांग्रेस पार्टी केंद्र कि सत्ता पर फिर काबिज़ हुई और उसके बाद महंगाई बे-लगाम बढती गई, सरकार ने ध्यान ही नहीं दिया कि इस बढती महंगाई में जनता कैसे अपने जीवन को चला पाएंगी मध्यमवर्ग और नीचलावर्ग इस महंगाई में पीस ही गया लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठने के बजाय और नीचे ही गिरता चला गया। जो इस महंगाई का सामना नहीं कर पाए वो दुनियां से ही पलायन कर गए। इस महंगाई के दौर में अमीर और अमीर बना और गरीब और गरीब हुआ। यह सरकार के गलत नीतियों का ही परिणाम था।
इसी सरकार में कुछ इतने बड़े-बड़े घोटाले हुए जिसकी कल्पना भी आम जनता नहीं कर सकती है। 2G स्पैक्ट्रम घोटाल १७६३७९ करोड़ रूपये का , कामन वेल्थ गेम घोटाला यह ८००० करोड़ रुपये का , आदर्श हाऊसिंग सोसाइटी घोटाला (कारगिल युद्ध में शहीद सैनिको के परिजनों के लिए तथा कारगिल के वीरों के लिए) और न जाने छोटे बड़े कितने घोटाले होंगे जो उजागर नहीं हो पाए है।
स्विट्जरलैंड के बैंक में सत्तर लाख करोड़ रुपया भारत का जो कालाधन के रूप में पड़ा है उसके लिए भी सरकार कोई पहल नहीं कर रही है ताकि उस रुपये को भारत लाकर देश को एक सम्प्पन राष्ट बनाया जा सके।
देश कि आर्थिक स्थिति सुधरी है लेकिन किसके लिए क्या गाँव में रहने वाला किसान जो पूरी जिंदगी खेतो में हल चला कर भी दो वक्त कि रोटियां नहीं जुटा पाता है अपने परिवार को एक अच्छी जिंदगी नहीं दे पाता है। वह मजदुर जो गावों में रहता है जो पूरी जिन्दगी मजदूरी करता है फिर भी कभी पेट भर खाना नहीं खा पाता है। उसे क्या मालूम कि देश तरक्की कर रहा है, क्यों कि उसके दिनचर्या में कोई तबदीली नहीं आई है जैसा वह कल था वैसा ही आज भी है।
लोकसभा और राज्यसभा में जितने भी सांसद है वो सभी करोडपती या अरबपती है (वो भले ही पहले गरीबी से आये हो लेकिन आज वो गरीब नहीं है ) ये गरीबो के बारे क्या सोंचेगे इनको तो कारपोरेट घराने से मतलब है और ये कार्पोरेट घराने के लिए काम भी करते है और उन्ही के हितो के लिए संसद में कानून भी बनाते है।
संसद में सच्चे समाजसेवी नेताओं कि संख्या कम होने लगी है जब कोई समाजसेवी नेता सांसद बनता है तो वह समाज कि हितो कि बात करता है या उनके लिए उनके हितो के लिए संसद में आवाज़ उठता है लेकिन अब चुनाव हाईटेक हो गया है। अब चुनाव जीतने के लिए ज्यादा पैसो कि जरुरत पड़ती है। अब उम्मीदवार ऐ सी रूम में बैठ कर चुनाव जीतने कि प्लानिंग करते है और चुनाव जीतते है। जब ये बेशुमार पैसे खर्च कर चुनाव जीतते है तो फिर गरीबो के बारे में क्यों सोंचेंगे ?
अब भारतीय राजनीत में अधिवक्ताओ कि संख्या तेजी से बढ़ने लगी है वर्तमान सरकार में ज्यादातर मंत्रिपद अधिवक्ता के ही हाथ में है साथ ही साथ विपच्छ में भी लोकसभा और राज्यसभा में विपच्छ के नेता पद पर अधिवक्ता ही विराजमान है। अब ये अधिवक्ता अपने केश के लिए उलटे सीधे गवाह खड़ा करते है सच को झूठ और झूठ को सच बनाकर केश जीतते है। तो ये समाज का क्या भला कर सकते है ? माना ये पढ़े लिखे अच्छा वक्ता है कानून का ज्ञान इन्ही के पास है लेकिन यह जरुरी नहीं एक अच्छा पढ़ा लिखा व्यक्ति एक अच्छा राजनेता या समाजसेवक बन सके।
अन्ना हजारे का आन्दोलन कामयाब होने का मुख्य कारण यही है कि वर्तमान केंद्र में बैठी सरकार जनता के हितो का ख्याल नहीं किया अगर ख्याल किया होता तो इस तरह का आन्दोलन कभी कामयाब होता ही नहीं। आज जनता अपने चुने हुए जन-प्रतिनिधि तथा सरकार से उदासीन है। ऐसी नौबत क्यों आई इस पर सांसद और सरकार को मंथन करना चाहिए, कहाँ सरकार के कार्यो में चुक हुई जिसके चलते अन्ना हजारे का आन्दोलन कामयाब हुआ और सरकार को उनके मांगों के सामने झुकना पड़ा।


Friday, August 26, 2011

अन्ना कि ललकार

अन्ना कि ललकार पर उमड़ा जन सैलाब है।
आगे-आगे बढ़ते जाओ मंजिल तेरे पास है।।
थकना नहीं न डरना है बस आगे ही बढना है।
आगे बढ़कर लेलो तुम जो तेरा अधिकार है।।
अन्ना कि ललकार पर उमड़ा जन सैलाब है।
अन्ना हजारे के अनशन का आज बारहवा दिन है और वो आज भी उसी मुस्तैदी से खड़े है जैसा कि पहले दिन खड़े थे। भगवन अन्ना के शारीरिक शक्ति को इतनी शक्ति प्रदान करें कि अन्ना जनता कि लड़ाई जीत सके। यह लड़ाई जनता बनाम सांसद हो गई है। हमारे जन प्रतिनिधि संसद में जाकर उसी जनता को भूल गए है जो जनता अपना बहुमूल्य वोट देकर इनको संसद में भेजी है। भारत एक लोकतान्त्रिक देश है और लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है ये हमारे सांसद भली प्रकार समझते है फिर ना जाने कौन सी ऐसी लालच है जो जनता कि आवाज़ ये नहीं सुन पा रहें है। जनता में अशीम शक्ति है लेकिन जनता अपनी शक्ति को नहीं पहचानती है जिसका फायदा जन-प्रतिनिधि उठाते रहते है लेकिन जब जनता जाग जाती है तो फिर कोई ताकत उसको रोक नहीं पाति है। जैसे बाढ़ का पानी, चक्रवात, तूफ़ान, ज्वालामुखी इन सब को रोकना असंभव है उसी प्रकार जन-सैलाब को रोक पाना मुस्किल है जैसे ज्वालामुखी जब तक शांत रहता है तब-तक सब कुछ ठीक-ठाक रहता है लेकिन जब ज्वालामुखी फूटता है तो उसके सैलाब में हर चीज नेस्तनाबूद होते चला जाता है। उसी तरह जन-सैलाब है समय रहते उसकी आवाज़ को पहचान लेनी चाहिए नहीं तो इसके सैलाब में भी सब-कुछ ख़त्म हो जाता है।
यह आन्दोलन अन्ना हजारे ने शुरू तो कि लेकिन अब यह आन्दोलन जनता का आन्दोलन बन गया है और जनता यह समझने लगी है कि अन्ना हजारे उनके लिए अन्न छोड़कर आज बारह दिनों से अनशन पर बैठे है लेकिन संसद में बैठे हमारे सांसद जनता कि भावनाओं को नहीं समझ पा रहें है। अभी तक सब कुछ शांत है लेकिन जैसे ही अन्ना के साथ कुछ होता है तो फिर इस आन्दोलन को रोक पाना मुस्किल हो जायेगा क्यों कि इस आन्दोलन को नेत्रित्व देने वाले सिर्फ अन्ना है और फिर अन्ना विहीन आन्दोलन किस दिशा में जायेगा यह कहना बहुत मुस्किल है क्यों कि भीड़ का न कोई सोंच है ना कोई सक्ल।
भारतीय जनता एक लड़ाई अंग्रेजो से लड़ी तो देश कि आज़ादी हांसिल कि दूसरी जब लड़ाई लड़ी तो कोंग्रेस पार्टी कि सत्ता को पुरे देश से उखाड़ फेकी अब तीसरी लड़ाई वह भ्रष्टाचार से लड़ रही है और इसमें भी जीत जनता कि ही होगी।

Wednesday, August 24, 2011

भ्रष्टाचार एक बीमारी

भ्रष्टाचार एक लाइलाज बीमारी है जब यह बीमारी किसी को होती है तो उसके लक्छन शारीर पर विभिन्न प्रभाव डालते है :- जैसे
(१) इस बीमारी का प्रभाव सबसे पहले मानव के मस्तिस्क पर होता उसके सोंचने समझने कि शक्ति छिड हो जाती है उसे अच्छे और बुरे में पहचान करना मुस्किल हो जाता, वह सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोंचता है उसे ज्यादा कोई भी चीज कम ही लगती है उसकी इकच्छाएं अनंत हो जाती है वह थोड़े में यकीन नहीं करता। उसे हर चीज ज्यादा चाहिए (यानि वह असंतोष ग्रसित हो जाता है।)
(२) इस बीमारी का प्रभाव मानव के विचारों पर पड़ता है। एक अच्छे खासे विचारधारा का व्यक्ति बुरे विचारधारा का बन जाता है। उसकी सोंच में विचार में प्रतिदिन परिवर्तन होते है। वह व्यभिचारी और बुरे कर्मो में लिप्त रहने लगता है, चारित्रिक तौर पर उसका पतन हो जाता है। (यानि वह कुकर्म ग्रसित हो जाता है।)
(३) इस बीमारी का प्रभाव मानव के कार्य करने कि छमता पर भी पड़ता है। जो व्यक्ति भ्रटाचार ग्रसित हो जाता है वह अपने मासिक वेतन पर या जो कार्य के लिए जीस कुर्शी पर बैठा है, वह उसके साथ न्याय नहीं कर पाता है और गलत तरीके से पैसे लेकर गलत कार्य करता है। उसमे सही काम करने कि छमता न के बराबर हो जाती है और गलत तरीके से पैसे लेने पर उसकी कार्य छमता दुगनी हो जाती है। मतलब जिस कार्य के लिए उसको मासिक वेतन मिलता है उसके लिए वो वफादार नहीं होता है बल्कि उस व्यक्ति के लिए वह ज्यादा वफादार होता है जो उसको रिश्वत में कुछ पैसे दिए है । (यानि वह भ्रष्टाचार ग्रसित हो जाता है।)
(४) इस बीमारी का प्रभाव भ्रष्टाचार में लिप्त मानव के व्यक्तित्व पर तो पड़ता ही है साथ ही साथ उसके पत्नी, बेटा, बेटी और भाई, बहनों पर भी पड़ता है। गलत तरीके से पैसे आने पर वो भी गलत-गलत सौख पाल लेते है, नतीजा होता है कि सौख को पूरा करने के लिए वह किसी भी स्तर तक नीचे गिरते चले जाते है। आज खुलेआम ऐसे लड़के लड़कियां पार्टी, क्लब, होटल, रेस्टुरेंट वगैरह जगहों पर मिल जायेगें जिनको देख कर आप सोंचने पर मजबूर हो जायेगें कि ये भारतीय है या अंग्रेज, ज्यादातर इसमें वैसे ही लड़के या लड़कियां है जिनके माता या पिता रिश्वत खोर होते है।
(५) इस बीमारी का प्रभाव आदमी को ऐसा लालची और स्वार्थी बना देता है जो अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए वह उन सीमाओं को भी लाँघ जाता है जहाँ मानवता ख़त्म हो जाती है। यानि अपने स्वार्थ के लिए किसी कि जान तक भी ले-लेता है । यह भ्रष्टाचार कि ही देन है जो उपरी तौर पर चमक दमक दिखाई तो देता है किन्तु अन्दर ही अन्दर मानशिक तौर पर खोखला कर देता है।
इन्सान जब स्कूल या कॉलेज में पढाई करता है तब उसके आदर्श और विचार बहुत ऊँचे होते है वह परिवार, समाज और देश को एक दिशा देने कि बात करता है, वह सामाजिक बन्धनों को मान्यता देता है, वह अपने द्वारा अर्जित या मासिक वेतन मिलने पर गरीबों को कुछ हिस्सा देने कि बात करता है, उस वक्त उसमे परोपकार कि भावना देश, समाज और परिवार के प्रति कर्तव्य, इन सभी भावनावों से ओतप्रोत रहता है। पर जब वह सरकारी नौकरी में जाता है तब भी कुछ वर्षो तक वह ठीक ठाक ही रहता है लेकिन जहाँ उसे भ्रष्टाचार रूपी बीमारी ग्रसित करती है तब वह उन सभी आदर्शो को भूल जाता है जो उसने विद्यार्थी जीवन में सोंचा था।

Tuesday, August 23, 2011

पूरे भारत में कांग्रेस को मिले वोट

अन्ना के आन्दोलन से जुड़े अपार जन समूह को देखने के बाद भी हमारे मंत्री और सांसद आन्दोलन के विरोध में बोलने से चुक नहीं रहे है। शायद इसकी खामियाजा आने वाले वक्त में भुगतना पड़ेगा।
हमारे कानून मंत्री श्री सलमान खुर्शीद साहब ने अपनी टिप्पड़ी में यह कहे है कि "सरकार अन्ना के आन्दोलन से कत्तई चिंतित नहीं है, क्यों कि यह आन्दोलन पूरे देश का प्रतिनिधित्व नहीं करता है, एक या दो लाख लोगों कि आवाज़ और उनकी इच्छा महत्वपूर्ण है, लेकिन उनकी इच्छा से ही किसी मुद्दे का हल नहीं हो सकता है।
यानि कि भारत कि जनसंख्या के हिसाब से दो लाख लोंगो कि गिनती नगण्य है जैसा कि सलमान खुर्शीद साहब कह रहे है। अगर भारतीय जनसँख्या का आकलन हम करे तो २०११ में ,२१०,१९३,४२२ जनसँख्या है, अब कांग्रेस पार्टी कि वोट संख्या देख ले जो पिछले चुनाव में मिले है पूरे भारत से , वह १५३४८२३५६ है। यानि कि सवा अरब कि आबादी में कांग्रेस पार्टी को साढ़े पंद्रह करोड़ वोट ही मिले जिसका प्रतिशत 12.६८% होता है तो फिर कांग्रेस पार्टी को कैसे कहा जा सकता है कि वह पूरे देश का नेत्रित्व कर रही है। मै देश कि जनसँख्या और कांग्रेस को मिले वोट कि बात नहीं कर रहा हूँ मैंने केवल आईना दिखाया, कोई भी संख्या बड़ी या छोटी नहीं होती है उसकी मांग को देखिये वह सही है या गलत है
आज जनता अन्ना हजारे के आन्दोलन से जुडती जा रही है हर दिन इसकी संख्या बढती जा रही है यह आन्दोलन दिल्ली से निकल कर भारत के हर बड़े शहरों से होते हुए छोटे शहरों गावों और कस्बो तक पहुँच गई है और आप सांसदों और मंत्रियों को एक दो लाख आदमी ही नज़र रहा है यह एक या दो लाख आदमी नहीं है यह जनता कि आवाज़ है उसकी आवाज़ को पहचानिए और समय रहते उसके जायज मांगो को मान लीजिये कही ऐसा हो कि जनता ही आपको छोड़ दे फिर हाथ मलते रह जाना पड़ेगा समुंदरी तूफ़ान में वही नाविक अपने नाव को किनारे पर ला पाता है जो तूफ़ान कि रुख को पहचान लेता है वैसे बहुत से नाविक उसी तूफ़ान में डूब जाते है जो तूफ़ान के रुख को नहीं पहचान पाते है समय रहते जनता कि आवाज़ को पहचानिए
रही बात जनता कि क्या वह कोई गलत मांग कर रही है वह आपसे जन लोकपाल कानून बनाने कि बात कर रही है क्यों कि जनता तंग चुकी है महंगाई, रिश्वतखोरी, बड़े-बड़े घोटाले, मुनाफाखोरी आदि आदि से


Monday, August 22, 2011

अन्ना का आन्दोलन

दिल्ली की सडकों पर उमड़ा जन सैलाब अद्भुत, अद्वितीय है, यह जन सैलाब दिल्ली की सडको से बढ़ते-बढ़ते अब भारत के हर राज्य, जिला और कस्बो तक बढ़ते जा रहा है, यह किसी को उम्मीद भी नहीं थी की एक छोटा सा आन्दोलन जन सैलाब में परिवर्तित हो जायेगा और भारत के कोने कोने तक पहुँच जायेगा ! इस आन्दोलन से जुड़ रहे लोग ऐसा नहीं की अनपढ़, गंवार और बेवकूफ लोग है बल्कि आज की पढ़ी लिखी २१वी सदी की जनता है वह अपना अच्छा और बुरा भली प्रकार समझती है और दिल्ली जैसे महानगर की जनता इतनी वेवकूफ नहीं है की भीड़ का हिस्सा बने, बल्कि इस आन्दोलन में जुड़े वह लोग है जो सरकार के प्रति उसके गलत नीतियों के प्रति, नीत नए उजागर हो रहे बड़े बड़े घोटाले, महंगाई इस सबसे त्रस्त लोग है उनकी कुंठित पड़ी भवनाएँ अब उबाल पर आ गई है, यह जन आक्रोश ही है जो सड़कों पर नज़र आने लगी है, इस जन सैलाब में शामिल वो लोग है जो अन्दर ही अन्दर कुंठित थे इनको कोई सही प्लेटफार्म नहीं मिल पा रहा था जहाँ अपनी भावनावों और बेवसी को व्यक्त कर सके, वह प्लेटफार्म अन्ना हजारे के आन्दोलन ने दिया जहाँ लोग टुकड़ियों में जुड़ने लगे टुकड़ियाँ भीड़ में तब्दील हुई और भीड़ जन-सैलाब में तब्दील होती चली गई अब तो यह जन-सैलाब भारत के हर शहरों से बढ़ता हुआ गाँव और कस्बो तक पहुँच गया है लेकिन हमारे सांसदों और मंत्रियों को यह समझ नहीं आ रहा है क्या गलत है और क्या सही है ! इसी जनता के द्वारा चुन कर ये सांसद बने है और उसी जनता की भावनावो को ये समझ नहीं पा रहे है, जनता अपना हक मांग रही है वह रिश्वतखोरी, दलाली, मंहगाई, बड़े-बड़े घोटाले इस सब से तंग आ चुकी है और उसके लिए एक जन-लोकपाल कानून बनाने की बात कर रही है तो सरकार वह कानून या तो बनाना नहीं चाहती है या फिर अपने शर्तो पर बनाना चाहती है, शायद संसद में बैठे सांसद या सरकार में बैठे मंत्री यह भूल रहे है जनता की आवाज़ को दबा देंगे, जब भी कोई जन-आन्दोलन हुआ है तो उसका परिणाम भी आया है चाहे वह महात्मा गाँधी का आन्दोलन हो या जयप्रकाश नारायण का उसके परिणाम सामने आये है, महात्मा गाँधी और जयप्रकाश नारायण ने आन्दोलन में अपना नेत्रित्व प्रदान किये और लोग जुड़ते गए इसका परिणाम भी सामने आया एक ने देश को आज़ादी दिलाई तो दुसरे ने केंद्र ही नहीं राज्यों से भी उस कांग्रेस की सरकार को सत्ता विहीन कर दिया जो देश की आज़ादी के बाद से केंद्र और पूरे भारत पर आसन जमाये बैठे था ! अन्ना हजारे तो आन्दोलन को नेत्रित्व ही प्रदान कर रहे है जनता उनके आन्दोलन से अपने आप जुडती जा रही है, इस आन्दोलन का भी परिणाम सामने आएगा, क्यों की जनता में जीतनी शक्ति है वह किसी भी सरकार में नहीं होती है, इसलिए सत्ता में बैठे लोंगो को हवा की रुख का पहचान होना चाहिए, समय रहते चेत जाना चाहिए कही ऐसा ना हो की पांव तले धरती ही खिसक जाये !