Friday, August 26, 2011

अन्ना कि ललकार

अन्ना कि ललकार पर उमड़ा जन सैलाब है।
आगे-आगे बढ़ते जाओ मंजिल तेरे पास है।।
थकना नहीं न डरना है बस आगे ही बढना है।
आगे बढ़कर लेलो तुम जो तेरा अधिकार है।।
अन्ना कि ललकार पर उमड़ा जन सैलाब है।
अन्ना हजारे के अनशन का आज बारहवा दिन है और वो आज भी उसी मुस्तैदी से खड़े है जैसा कि पहले दिन खड़े थे। भगवन अन्ना के शारीरिक शक्ति को इतनी शक्ति प्रदान करें कि अन्ना जनता कि लड़ाई जीत सके। यह लड़ाई जनता बनाम सांसद हो गई है। हमारे जन प्रतिनिधि संसद में जाकर उसी जनता को भूल गए है जो जनता अपना बहुमूल्य वोट देकर इनको संसद में भेजी है। भारत एक लोकतान्त्रिक देश है और लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है ये हमारे सांसद भली प्रकार समझते है फिर ना जाने कौन सी ऐसी लालच है जो जनता कि आवाज़ ये नहीं सुन पा रहें है। जनता में अशीम शक्ति है लेकिन जनता अपनी शक्ति को नहीं पहचानती है जिसका फायदा जन-प्रतिनिधि उठाते रहते है लेकिन जब जनता जाग जाती है तो फिर कोई ताकत उसको रोक नहीं पाति है। जैसे बाढ़ का पानी, चक्रवात, तूफ़ान, ज्वालामुखी इन सब को रोकना असंभव है उसी प्रकार जन-सैलाब को रोक पाना मुस्किल है जैसे ज्वालामुखी जब तक शांत रहता है तब-तक सब कुछ ठीक-ठाक रहता है लेकिन जब ज्वालामुखी फूटता है तो उसके सैलाब में हर चीज नेस्तनाबूद होते चला जाता है। उसी तरह जन-सैलाब है समय रहते उसकी आवाज़ को पहचान लेनी चाहिए नहीं तो इसके सैलाब में भी सब-कुछ ख़त्म हो जाता है।
यह आन्दोलन अन्ना हजारे ने शुरू तो कि लेकिन अब यह आन्दोलन जनता का आन्दोलन बन गया है और जनता यह समझने लगी है कि अन्ना हजारे उनके लिए अन्न छोड़कर आज बारह दिनों से अनशन पर बैठे है लेकिन संसद में बैठे हमारे सांसद जनता कि भावनाओं को नहीं समझ पा रहें है। अभी तक सब कुछ शांत है लेकिन जैसे ही अन्ना के साथ कुछ होता है तो फिर इस आन्दोलन को रोक पाना मुस्किल हो जायेगा क्यों कि इस आन्दोलन को नेत्रित्व देने वाले सिर्फ अन्ना है और फिर अन्ना विहीन आन्दोलन किस दिशा में जायेगा यह कहना बहुत मुस्किल है क्यों कि भीड़ का न कोई सोंच है ना कोई सक्ल।
भारतीय जनता एक लड़ाई अंग्रेजो से लड़ी तो देश कि आज़ादी हांसिल कि दूसरी जब लड़ाई लड़ी तो कोंग्रेस पार्टी कि सत्ता को पुरे देश से उखाड़ फेकी अब तीसरी लड़ाई वह भ्रष्टाचार से लड़ रही है और इसमें भी जीत जनता कि ही होगी।

Wednesday, August 24, 2011

भ्रष्टाचार एक बीमारी

भ्रष्टाचार एक लाइलाज बीमारी है जब यह बीमारी किसी को होती है तो उसके लक्छन शारीर पर विभिन्न प्रभाव डालते है :- जैसे
(१) इस बीमारी का प्रभाव सबसे पहले मानव के मस्तिस्क पर होता उसके सोंचने समझने कि शक्ति छिड हो जाती है उसे अच्छे और बुरे में पहचान करना मुस्किल हो जाता, वह सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोंचता है उसे ज्यादा कोई भी चीज कम ही लगती है उसकी इकच्छाएं अनंत हो जाती है वह थोड़े में यकीन नहीं करता। उसे हर चीज ज्यादा चाहिए (यानि वह असंतोष ग्रसित हो जाता है।)
(२) इस बीमारी का प्रभाव मानव के विचारों पर पड़ता है। एक अच्छे खासे विचारधारा का व्यक्ति बुरे विचारधारा का बन जाता है। उसकी सोंच में विचार में प्रतिदिन परिवर्तन होते है। वह व्यभिचारी और बुरे कर्मो में लिप्त रहने लगता है, चारित्रिक तौर पर उसका पतन हो जाता है। (यानि वह कुकर्म ग्रसित हो जाता है।)
(३) इस बीमारी का प्रभाव मानव के कार्य करने कि छमता पर भी पड़ता है। जो व्यक्ति भ्रटाचार ग्रसित हो जाता है वह अपने मासिक वेतन पर या जो कार्य के लिए जीस कुर्शी पर बैठा है, वह उसके साथ न्याय नहीं कर पाता है और गलत तरीके से पैसे लेकर गलत कार्य करता है। उसमे सही काम करने कि छमता न के बराबर हो जाती है और गलत तरीके से पैसे लेने पर उसकी कार्य छमता दुगनी हो जाती है। मतलब जिस कार्य के लिए उसको मासिक वेतन मिलता है उसके लिए वो वफादार नहीं होता है बल्कि उस व्यक्ति के लिए वह ज्यादा वफादार होता है जो उसको रिश्वत में कुछ पैसे दिए है । (यानि वह भ्रष्टाचार ग्रसित हो जाता है।)
(४) इस बीमारी का प्रभाव भ्रष्टाचार में लिप्त मानव के व्यक्तित्व पर तो पड़ता ही है साथ ही साथ उसके पत्नी, बेटा, बेटी और भाई, बहनों पर भी पड़ता है। गलत तरीके से पैसे आने पर वो भी गलत-गलत सौख पाल लेते है, नतीजा होता है कि सौख को पूरा करने के लिए वह किसी भी स्तर तक नीचे गिरते चले जाते है। आज खुलेआम ऐसे लड़के लड़कियां पार्टी, क्लब, होटल, रेस्टुरेंट वगैरह जगहों पर मिल जायेगें जिनको देख कर आप सोंचने पर मजबूर हो जायेगें कि ये भारतीय है या अंग्रेज, ज्यादातर इसमें वैसे ही लड़के या लड़कियां है जिनके माता या पिता रिश्वत खोर होते है।
(५) इस बीमारी का प्रभाव आदमी को ऐसा लालची और स्वार्थी बना देता है जो अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए वह उन सीमाओं को भी लाँघ जाता है जहाँ मानवता ख़त्म हो जाती है। यानि अपने स्वार्थ के लिए किसी कि जान तक भी ले-लेता है । यह भ्रष्टाचार कि ही देन है जो उपरी तौर पर चमक दमक दिखाई तो देता है किन्तु अन्दर ही अन्दर मानशिक तौर पर खोखला कर देता है।
इन्सान जब स्कूल या कॉलेज में पढाई करता है तब उसके आदर्श और विचार बहुत ऊँचे होते है वह परिवार, समाज और देश को एक दिशा देने कि बात करता है, वह सामाजिक बन्धनों को मान्यता देता है, वह अपने द्वारा अर्जित या मासिक वेतन मिलने पर गरीबों को कुछ हिस्सा देने कि बात करता है, उस वक्त उसमे परोपकार कि भावना देश, समाज और परिवार के प्रति कर्तव्य, इन सभी भावनावों से ओतप्रोत रहता है। पर जब वह सरकारी नौकरी में जाता है तब भी कुछ वर्षो तक वह ठीक ठाक ही रहता है लेकिन जहाँ उसे भ्रष्टाचार रूपी बीमारी ग्रसित करती है तब वह उन सभी आदर्शो को भूल जाता है जो उसने विद्यार्थी जीवन में सोंचा था।

Tuesday, August 23, 2011

पूरे भारत में कांग्रेस को मिले वोट

अन्ना के आन्दोलन से जुड़े अपार जन समूह को देखने के बाद भी हमारे मंत्री और सांसद आन्दोलन के विरोध में बोलने से चुक नहीं रहे है। शायद इसकी खामियाजा आने वाले वक्त में भुगतना पड़ेगा।
हमारे कानून मंत्री श्री सलमान खुर्शीद साहब ने अपनी टिप्पड़ी में यह कहे है कि "सरकार अन्ना के आन्दोलन से कत्तई चिंतित नहीं है, क्यों कि यह आन्दोलन पूरे देश का प्रतिनिधित्व नहीं करता है, एक या दो लाख लोगों कि आवाज़ और उनकी इच्छा महत्वपूर्ण है, लेकिन उनकी इच्छा से ही किसी मुद्दे का हल नहीं हो सकता है।
यानि कि भारत कि जनसंख्या के हिसाब से दो लाख लोंगो कि गिनती नगण्य है जैसा कि सलमान खुर्शीद साहब कह रहे है। अगर भारतीय जनसँख्या का आकलन हम करे तो २०११ में ,२१०,१९३,४२२ जनसँख्या है, अब कांग्रेस पार्टी कि वोट संख्या देख ले जो पिछले चुनाव में मिले है पूरे भारत से , वह १५३४८२३५६ है। यानि कि सवा अरब कि आबादी में कांग्रेस पार्टी को साढ़े पंद्रह करोड़ वोट ही मिले जिसका प्रतिशत 12.६८% होता है तो फिर कांग्रेस पार्टी को कैसे कहा जा सकता है कि वह पूरे देश का नेत्रित्व कर रही है। मै देश कि जनसँख्या और कांग्रेस को मिले वोट कि बात नहीं कर रहा हूँ मैंने केवल आईना दिखाया, कोई भी संख्या बड़ी या छोटी नहीं होती है उसकी मांग को देखिये वह सही है या गलत है
आज जनता अन्ना हजारे के आन्दोलन से जुडती जा रही है हर दिन इसकी संख्या बढती जा रही है यह आन्दोलन दिल्ली से निकल कर भारत के हर बड़े शहरों से होते हुए छोटे शहरों गावों और कस्बो तक पहुँच गई है और आप सांसदों और मंत्रियों को एक दो लाख आदमी ही नज़र रहा है यह एक या दो लाख आदमी नहीं है यह जनता कि आवाज़ है उसकी आवाज़ को पहचानिए और समय रहते उसके जायज मांगो को मान लीजिये कही ऐसा हो कि जनता ही आपको छोड़ दे फिर हाथ मलते रह जाना पड़ेगा समुंदरी तूफ़ान में वही नाविक अपने नाव को किनारे पर ला पाता है जो तूफ़ान कि रुख को पहचान लेता है वैसे बहुत से नाविक उसी तूफ़ान में डूब जाते है जो तूफ़ान के रुख को नहीं पहचान पाते है समय रहते जनता कि आवाज़ को पहचानिए
रही बात जनता कि क्या वह कोई गलत मांग कर रही है वह आपसे जन लोकपाल कानून बनाने कि बात कर रही है क्यों कि जनता तंग चुकी है महंगाई, रिश्वतखोरी, बड़े-बड़े घोटाले, मुनाफाखोरी आदि आदि से


Monday, August 22, 2011

अन्ना का आन्दोलन

दिल्ली की सडकों पर उमड़ा जन सैलाब अद्भुत, अद्वितीय है, यह जन सैलाब दिल्ली की सडको से बढ़ते-बढ़ते अब भारत के हर राज्य, जिला और कस्बो तक बढ़ते जा रहा है, यह किसी को उम्मीद भी नहीं थी की एक छोटा सा आन्दोलन जन सैलाब में परिवर्तित हो जायेगा और भारत के कोने कोने तक पहुँच जायेगा ! इस आन्दोलन से जुड़ रहे लोग ऐसा नहीं की अनपढ़, गंवार और बेवकूफ लोग है बल्कि आज की पढ़ी लिखी २१वी सदी की जनता है वह अपना अच्छा और बुरा भली प्रकार समझती है और दिल्ली जैसे महानगर की जनता इतनी वेवकूफ नहीं है की भीड़ का हिस्सा बने, बल्कि इस आन्दोलन में जुड़े वह लोग है जो सरकार के प्रति उसके गलत नीतियों के प्रति, नीत नए उजागर हो रहे बड़े बड़े घोटाले, महंगाई इस सबसे त्रस्त लोग है उनकी कुंठित पड़ी भवनाएँ अब उबाल पर आ गई है, यह जन आक्रोश ही है जो सड़कों पर नज़र आने लगी है, इस जन सैलाब में शामिल वो लोग है जो अन्दर ही अन्दर कुंठित थे इनको कोई सही प्लेटफार्म नहीं मिल पा रहा था जहाँ अपनी भावनावों और बेवसी को व्यक्त कर सके, वह प्लेटफार्म अन्ना हजारे के आन्दोलन ने दिया जहाँ लोग टुकड़ियों में जुड़ने लगे टुकड़ियाँ भीड़ में तब्दील हुई और भीड़ जन-सैलाब में तब्दील होती चली गई अब तो यह जन-सैलाब भारत के हर शहरों से बढ़ता हुआ गाँव और कस्बो तक पहुँच गया है लेकिन हमारे सांसदों और मंत्रियों को यह समझ नहीं आ रहा है क्या गलत है और क्या सही है ! इसी जनता के द्वारा चुन कर ये सांसद बने है और उसी जनता की भावनावो को ये समझ नहीं पा रहे है, जनता अपना हक मांग रही है वह रिश्वतखोरी, दलाली, मंहगाई, बड़े-बड़े घोटाले इस सब से तंग आ चुकी है और उसके लिए एक जन-लोकपाल कानून बनाने की बात कर रही है तो सरकार वह कानून या तो बनाना नहीं चाहती है या फिर अपने शर्तो पर बनाना चाहती है, शायद संसद में बैठे सांसद या सरकार में बैठे मंत्री यह भूल रहे है जनता की आवाज़ को दबा देंगे, जब भी कोई जन-आन्दोलन हुआ है तो उसका परिणाम भी आया है चाहे वह महात्मा गाँधी का आन्दोलन हो या जयप्रकाश नारायण का उसके परिणाम सामने आये है, महात्मा गाँधी और जयप्रकाश नारायण ने आन्दोलन में अपना नेत्रित्व प्रदान किये और लोग जुड़ते गए इसका परिणाम भी सामने आया एक ने देश को आज़ादी दिलाई तो दुसरे ने केंद्र ही नहीं राज्यों से भी उस कांग्रेस की सरकार को सत्ता विहीन कर दिया जो देश की आज़ादी के बाद से केंद्र और पूरे भारत पर आसन जमाये बैठे था ! अन्ना हजारे तो आन्दोलन को नेत्रित्व ही प्रदान कर रहे है जनता उनके आन्दोलन से अपने आप जुडती जा रही है, इस आन्दोलन का भी परिणाम सामने आएगा, क्यों की जनता में जीतनी शक्ति है वह किसी भी सरकार में नहीं होती है, इसलिए सत्ता में बैठे लोंगो को हवा की रुख का पहचान होना चाहिए, समय रहते चेत जाना चाहिए कही ऐसा ना हो की पांव तले धरती ही खिसक जाये !