Wednesday, August 24, 2011

भ्रष्टाचार एक बीमारी

भ्रष्टाचार एक लाइलाज बीमारी है जब यह बीमारी किसी को होती है तो उसके लक्छन शारीर पर विभिन्न प्रभाव डालते है :- जैसे
(१) इस बीमारी का प्रभाव सबसे पहले मानव के मस्तिस्क पर होता उसके सोंचने समझने कि शक्ति छिड हो जाती है उसे अच्छे और बुरे में पहचान करना मुस्किल हो जाता, वह सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोंचता है उसे ज्यादा कोई भी चीज कम ही लगती है उसकी इकच्छाएं अनंत हो जाती है वह थोड़े में यकीन नहीं करता। उसे हर चीज ज्यादा चाहिए (यानि वह असंतोष ग्रसित हो जाता है।)
(२) इस बीमारी का प्रभाव मानव के विचारों पर पड़ता है। एक अच्छे खासे विचारधारा का व्यक्ति बुरे विचारधारा का बन जाता है। उसकी सोंच में विचार में प्रतिदिन परिवर्तन होते है। वह व्यभिचारी और बुरे कर्मो में लिप्त रहने लगता है, चारित्रिक तौर पर उसका पतन हो जाता है। (यानि वह कुकर्म ग्रसित हो जाता है।)
(३) इस बीमारी का प्रभाव मानव के कार्य करने कि छमता पर भी पड़ता है। जो व्यक्ति भ्रटाचार ग्रसित हो जाता है वह अपने मासिक वेतन पर या जो कार्य के लिए जीस कुर्शी पर बैठा है, वह उसके साथ न्याय नहीं कर पाता है और गलत तरीके से पैसे लेकर गलत कार्य करता है। उसमे सही काम करने कि छमता न के बराबर हो जाती है और गलत तरीके से पैसे लेने पर उसकी कार्य छमता दुगनी हो जाती है। मतलब जिस कार्य के लिए उसको मासिक वेतन मिलता है उसके लिए वो वफादार नहीं होता है बल्कि उस व्यक्ति के लिए वह ज्यादा वफादार होता है जो उसको रिश्वत में कुछ पैसे दिए है । (यानि वह भ्रष्टाचार ग्रसित हो जाता है।)
(४) इस बीमारी का प्रभाव भ्रष्टाचार में लिप्त मानव के व्यक्तित्व पर तो पड़ता ही है साथ ही साथ उसके पत्नी, बेटा, बेटी और भाई, बहनों पर भी पड़ता है। गलत तरीके से पैसे आने पर वो भी गलत-गलत सौख पाल लेते है, नतीजा होता है कि सौख को पूरा करने के लिए वह किसी भी स्तर तक नीचे गिरते चले जाते है। आज खुलेआम ऐसे लड़के लड़कियां पार्टी, क्लब, होटल, रेस्टुरेंट वगैरह जगहों पर मिल जायेगें जिनको देख कर आप सोंचने पर मजबूर हो जायेगें कि ये भारतीय है या अंग्रेज, ज्यादातर इसमें वैसे ही लड़के या लड़कियां है जिनके माता या पिता रिश्वत खोर होते है।
(५) इस बीमारी का प्रभाव आदमी को ऐसा लालची और स्वार्थी बना देता है जो अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए वह उन सीमाओं को भी लाँघ जाता है जहाँ मानवता ख़त्म हो जाती है। यानि अपने स्वार्थ के लिए किसी कि जान तक भी ले-लेता है । यह भ्रष्टाचार कि ही देन है जो उपरी तौर पर चमक दमक दिखाई तो देता है किन्तु अन्दर ही अन्दर मानशिक तौर पर खोखला कर देता है।
इन्सान जब स्कूल या कॉलेज में पढाई करता है तब उसके आदर्श और विचार बहुत ऊँचे होते है वह परिवार, समाज और देश को एक दिशा देने कि बात करता है, वह सामाजिक बन्धनों को मान्यता देता है, वह अपने द्वारा अर्जित या मासिक वेतन मिलने पर गरीबों को कुछ हिस्सा देने कि बात करता है, उस वक्त उसमे परोपकार कि भावना देश, समाज और परिवार के प्रति कर्तव्य, इन सभी भावनावों से ओतप्रोत रहता है। पर जब वह सरकारी नौकरी में जाता है तब भी कुछ वर्षो तक वह ठीक ठाक ही रहता है लेकिन जहाँ उसे भ्रष्टाचार रूपी बीमारी ग्रसित करती है तब वह उन सभी आदर्शो को भूल जाता है जो उसने विद्यार्थी जीवन में सोंचा था।

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