Monday, September 24, 2012

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह "दिनकर" का जन्मदिन

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह "दिनकर" का आज के दिन 23 सितम्बर 1908 को बिहार के बेगुसराय जिले के सिमरिया गाँव में हुआ था ! उनकी प्राथमिक शिक्षा गाँव के ही स्कूल में व उसके बाद बारो मध्य विधालय से। मैट्रिक मोकामा हाई स्कूल से तथा पटना यूनिवर्सिटी से इंटर व इतिहास प्रतिष्ठा की डिग्री। दिनकर जी द्वारा साहित्य सृजन - विजय सन्देश, प्रणभंग, रेणुका, हुँकार, कुरुछेत्र, रसवंती, बापू, रश्मिरथी, उर्वशी, हरे को हरी नाम, मिर्च का राजा, सामधेनी, उजली आग, संस्कृति के चार उपाय, विवाह की मुसीबते, धर्म नैतिकता व विज्ञान, बट पीपल तथा अन्य और रचनाएं है। उनका संसदीय जीवन 1952 से 1964 तक राजसभा के सांसद के रूप में रहा।                                                   
उनके द्वारा लिखित रचनाएं तो बहुत सी है लेकिन मै रश्मिरथी पर चर्चा कर रहा हूँ।
दिनकर जी ने रश्मिरथी में महाभारत काल के एक ऐसे वीर चरित्र को रश्मिरथी का नायक बनाये है जो हमारे सभ्य समाज में वैसे पात्र की कोई पहचान नहीं होती या सामाजिक मर्यादाओं में कोई महत्त्व नहीं दिया जाता है, जिसके पिता की पहचान न हो यानि नाजायज संतान। 
वीर कर्ण थे तो सूर्य पुत्र लेकिन उनके पूरे जीवन काल में सूतपुत्र कहकर ही उनको संबोधित किया गया है। पांडवो के बड़े भ्राता होने बावजूद भी उनको पांडवो से कोई सम्मान नहीं मिला बल्कि उनको हर तरह से छलने की कोशिश की गई है। माता कुंती को यह मालूम होने के बाद भी की कर्ण उनका ही पुत्र है, लोक लज्जा के डर से कर्ण को नहीं अपना सकी। छोटे भ्रातावों के द्वारा बार-बार अपमानित होने के बाद भी माता कुंती द्वारा कोई प्रतिक्रिया व्यक्त न करना यह लोक-लज्जा ही तो थी ऐसे में कर्ण को युर्योधन के द्वारा मान-सम्मान मिलता है।
क्यों की युर्योधन पांडवो को देखना नहीं चाहता था और उसने कर्ण की वीरता को देख चूका था उसे यह मालूम हो गया था की कर्ण अर्जुन से भी बड़ा वीर योद्धा है। और उसने कर्ण के बल पर ही महाभारत की लड़ाई लड़ने की ठान ली। महाभारत के परिणाम तो सभी को मालूम है।
रश्मिरथी से :-
रंग-भूमि में अर्जुन था जब समाँ अनोखा बाँधे,
बढ़ा भीड़-भीतर से सहसा कर्ण शरासन साधे।
कहता हुआ, 'तालियों से क्या रहा गर्व में फूल?
अर्जुन! तेरा सुयश अभी क्षण में होता है धूल।'


'तूने जो-जो किया, उसे मैं भी दिखला सकता हूँ,
चाहे तो कुछ नयी कलाएँ भी सिखला सकता हूँ।
आँख खोल कर देख, कर्ण के हाथों का व्यापार,
फूले सस्ता सुयश प्राप्त कर, उस नर को धिक्कार।'


इस प्रकार कह लगा दिखाने कर्ण कलाएँ रण की,
सभा स्तब्ध रह गयी, गयी रह आँख टँगी जन-जन की।
मन्त्र-मुग्ध-सा मौन चतुर्दिक् जन का पारावार,
गूँज रही थी मात्र कर्ण की धन्वा की टंकार।



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