Friday, January 18, 2013

ज़मीदोह होती भारतीय राजनीति



आज देश की राजनीति का आलम यह है की अब ये नेता नामक प्राणी या मंत्री समाजसेवी कम लूटेरे ज्यादा हो गए है एक समय वो भी था जब देश के राजनेताओं की तस्वीर को लोग फ्रेम कराकर घरों में टांगते थे उस नेता को अपना आदर्श मानते थे उसके चरित्र को अपने जीवन में अपनाते थे उसके नक़्शे कदम पर चलते की कोशिश करते थे और उसका अनुशरण कर उसी की तरह बनना चाहते थे  धीरे-धीरे समय बदला लोग बदले व्यापार करने का तरीका बदला साथ में बदली राजनीति करने का तरीका अब हालत यह है की राजनेता समाज सेवा करने के लिए या देश को दिशा देने के लिए राजनीति में नहीं आ रहे है बल्कि राजनीति के माध्यम से धनोपार्जन करने के लिए राजनीति में आ रहे है खुदा न खस्ता अगर राजनीती में इनकी पैठ बन जाती है और ये मंत्री पद पा लेते है तो इनकी तो पौबारह हो जाती है। पद, पावर और पैसा सबकुछ इनके पास आ जाता है । पद, पैसा और पावर आने के बाद इन नेताओं की सोंच में एक बहुत बड़ा परिवर्तन आता है अब ये आम से खास बन जाते है और उन खास लोगों के बीच में हमेशा अपनी उपस्थिति बनाये रखना चाहते है जिसका नतीजा यह होता है की ये पैसा कमाने के लिए अपने पद और पावर का दुरूपयोग करना शुरू कर देते है, ये इतने भ्रष्ट और पतीत जाते है की अपने पद पर बने रहने के लिए उद्योगपतियों से (चाहे वह देशी हो या विदेशी) किसी भी स्तर पर समझौता करने को तैयार हो जाते है चाहे देश या देश की जनता चूल्हे भांड में क्यों न जाय ? एक बार राजनीति में पैठ बनाने के बाद ये नेता वंशवाद का  सिलसिला शुरू कर देते है अब ये एक एक कर अपने भाई, भतीजा, पत्नी, बेटा और बेटी तक को राजनीति में लाना शुरू कर देते है, अब ऐसे चरित्रवान नेताओं के सगे सम्बन्धी कितने चरित्रवान हो सकते है यह सभी को मालूम है । अब ऐसे नेता या मंत्री से देश की जनता या देश क्या उम्मीद कर सकता है जो चारित्रिक तौर पर भ्रष्ट हो चुके है। आज राजनीती का आलम यह है की भारत की जीतनी भी राजनितिक पार्टियां है वह किसी न किसी व्यक्ति विशेष की अपनी प्राइवेट लिमिटेड पार्टी है और इनकी पार्टी में ऐसे ही व्यक्ति का पदार्पण हो सकता है जो पार्टी आलाकमान की चाहे वह गलत बात ही क्यों ना करता हो, उनकी गलत नीतियाँ ही क्यों ना हो हाँ में हाँ मिलाना पड़ेगा मतलब यह की पार्टी आलाकमान के इच्छाओं के अनुरूप चलना पड़ेगा उनके विरुद्ध जाकर आप उनके पार्टी में बने नहीं रह सकते है यानि की अपनी इक्षावों की तिलांजलि देकर कर ही उनके पार्टी में बने रह सकते है ।  अब ऐसे नेता से भारत की आम जनता क्या उम्मीद कर सकती है जो चुना तो जाता है जनता के द्वारा लेकिन सुनता केवल है अपने पार्टी आलाकमान का ।  क्या वो जनता का प्रतिनिधि हो सकता है ? क्या वह जनता के भला के लिए आवाज़ उठा सकता है ? आज इस देश में एक या दो ही पार्टियाँ बची है जिसके अध्यक्षों का चुनाव होता है तो पुराने चेहरे की जगह नया चेहरा नज़र आता है लेकिन भारत की ऐसी तमाम पार्टियाँ है चाहे वह राष्ट्रिय स्तर की हो या छेत्रीय स्तर की सभी का आलम यह है की उसके अध्यक्ष एक ही होते है और वही उस पार्टी का सर्वेसर्वा (मालिक) होता है । 
अब जो प्राइवेट लिमिटेड पार्टियाँ है क्या वह जनता के उम्मीदों पर खरा उतरती है, नहीं, क्यों की वह जनता का वोट पैसे देकर खरीदती है या गलत आश्वासन देकर जनता को मुर्ख बना कर वोट हांसिल करती है । आज राजनितिक पार्टियों का आलम यह है की चुनावी आमसभा में खुल्लमखुल्ला जनता को यह आश्वाशन देते है की हमारी सरकार अगर बनती है तो हम वैसे विद्यार्थियों को टेबलेट या लैपटॉप देंगे जो मैट्रिक की पढाई कर रहा है या वैसे लोगों को जो गरीब है इतने वर्गफीट का दो कमरे का मकान मुहैया कराएगें ऐसे तरह तरह के आश्वासन देकर ये राजनितिक पार्टियाँ जनता को लालच देकर उसका वोट हांसिल करती है भले चुनाव जीतने के बाद जनता से किये वादे उसे याद रहे या न रहे । लेकिन जनता को मुर्ख बना कर वोट तो हांसिल कर ही लेते है । आज राष्ट्रिय स्तर की कोई भी ऐसी पार्टी नहीं है जो पूर्ण बहुमत हांसिल कर केंद्र की सत्ता में सरकार बना सके, उसे केंद्र में सरकार बनाने की लिए छेत्रीय पार्टियों से समझौता करना पड़ता है और यही से शुरू होता है छेत्रीय पार्टियों की ब्लैकमेलिंग । अब वो अपने सांसदों की संख्याओं के आधार पर मलाईदार मंत्री पद की मांग करते है और सरकार बनाने की मज़बूरी में ही सही उनको वह मंत्री पद देना पड़ता है और यही से शुरू होता है लूट खसोट, जनता के पैसों का बंदरबांट। केंद्र में अब किसी एक पार्टी की सत्ता नहीं है बल्कि कई एक पार्टियाँ मिलकर सत्ता चलाती है जिसका नाम दिया गया है यूपीए और एनडीए । जिस पार्टी का सबसे ज्यादा सांसद होते है, प्रधानमंत्री का पद उसी पार्टी को जाता है भले ही प्रधानमंत्री पद के लायक उस पार्टी में कोई व्यक्ति हो या ना हो। अब जहाँ जोड़ तोड़ कर बहुमत जुटा कर सरकार बनाई जाती है वहां क्या जनता के हितों के लिए या देश के हितों के लिए सोंच सार्थक हो सकती है ? आज केंद्र में यूपीए की सरकार है जिसमे सबसे ज्यादा सांसद कांग्रेस पार्टी के है इस आधार पर प्रधानमंत्री का पद कांग्रेस के खाते में है और श्री मनमोहन सिंह जो राज्यसभा से सांसद है वो प्रधानमंत्री पद के योग्य उम्मीदवार समझे गए इसलिए प्रधानमंत्री के पद पर उनको बैठाया गया, अब इनके प्रधानमंत्रित्व काल में क्या क्या हुआ इससे पूरा देश अवगत है। आज महंगाई का आलम यह है की सौ रुपये की कीमत दस रुपये के बराबर पहुँच गई है। इनके शासनकाल में जमीन आसमान और पाताल तक घोटाले हो चुके है, गरीब और गरीब हुआ है अमीर और अमीर, गैस सिलिंडर पर जो सब्सिडी मिलता था वह सब्सिडी हटा ली गई है और एक परिवार को साल में मात्र छह सिलिंडर ही कंट्रोल रेट पर मिलेगा। इनकी सरकार ने महात्मा गाँधी के नाम पर गाँव में मनरेगा के तहत 365 दिनों में मात्र 100 दिन का रोज़गार मुहैया कराने का कानून बनाया ताकि गाँव के लोगों को मजदूर बनाकर जीने पर मजबूर किया जाय, अब आम लोगों को सब्सिडी का पैसा देने की बात की जा रही है, यानि आम लोगों को भिखारी बनाने पर आमादा है ये यूपीए की सरकार। जनता का ही पैसा जनता को देकर यह सरकार वाहवाही लूटना चाहती है, यूपीए की सरकार यह नहीं चाहती की भारत के लोग आत्मसम्मान से जी सके। भारत सरकार को इसके लिए पहल करनी चाहिए। आज तक इस देश में जितने भी घोटाले हुए है अगर भारत के राजनेता उन घोटालों को रोक पाते तो सचमुच भारत आज फिर से सोने की चिड़ियाँ बन जाता और इस देश में एक बार फिर दूध की नदियाँ बहती लेकिन ऐसा नहीं हो सका। आज तक इस देश को सभी लोगों ने लूटा है चाहे वो मुग़ल साम्राज्य रहा हो, ब्रितानियाँ सरकार रही हो या फिर देश आज़ाद होने बाद देश के राजनेता। अब भी समय है की हम इस देश को एक बार फिर इसका पुराना अतीत लौटा सकते है अगर हमारे देश के राजनेता देश का हर नागरिक इस देश को अपना समझे और देश को आगे बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील हो।

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